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आखिर क्यूँ भारत और पाकिस्तान एक दूसरे को अपने न्यूक्लियर (nuclear) हथियार के ठिकाने के बारे में बताते हैं…?

 

1986- 1987 में भारत की सेना द्वारा बड़े पैमाने पर एक अभ्यास चलाया गया था। जिसका नाम Brasstacks था। इस अभ्यास के दौरान पाकिस्तान को ये लगने लगा था की भारत पाकिस्तान के उस जगह पर हमला करने के बारे में सोच रहा है जहां पर उसके न्यूक्लियर (nuclear) हथियार है। इसके बाद दोनों ही देश के विदेश मंत्री आपस में बात- चीत करने लगे और न्यूक्लियर (nuclear) हथियार के  नियंत्रण को लेकर कुछ समझोते के बारे में सोचने लगे। 1988 चुनाव के बाद पाकिस्तान के प्रधान मंत्री बेनाज़िर भुट्टो ने भारत के प्रधान मंत्री राजीव गांधी को पाकिस्तान दौरे पर बुलाया था। 21 दिसम्बर 1988 को भारत के प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने पाकिस्तान का दौरा किया और नॉन- न्यूक्लियर अटैक एग्रीमंट (non- nuclear attack agreement) पर हस्ताक्षर किए। उसके बाद भारत और पाकिस्तान के संसद ने उसे मंजूरी दी और उसके बाद से उसका पालन शुरू हुआ।

1 जनवरी 1992 को भारत और पाकिस्तान ने पहली बार अपने न्यूक्लियर हथियार के ठिकाने के बारे में एक दूसरे को बताया था। इस संधि में भारत और पाकिस्तान न तो कभी एक दूसरे के न्यूक्लियर हथियार के ठिकाने को निशाना बनाएँगे और न ही किसी दूसरे देश को वहाँ हमला करने को उक्साएंगे। यह संधि दोनों देशो को यह भरोसा दिलाती है की चाहे एक दूसरे के साथ संबंध कितने भी खराब क्यूँ न हो जाएँ तब भी दोनों देश कभी भी उस जगह पर हमला नहीं करेंगे जहां उनके न्यूक्लियर (nuclear) हथियार हैं। दोनों ही देश ऐसा इसलिए करते हैं क्यूकी अगर कभी किसी देश ने दूसरे देश पर न्यूक्लियर (nuclear) हथियार या किसी और हथियार से हमला किया और वहाँ पर उस देश का न्यूक्लियर (nuclear) हथियार मौजूद हो तो तबाही काफी गुना बढ़ सकती हैं। इस ही वजह से दोनों देश हर साल 1 जनवरी को अपने न्यूक्लियर (nuclear) हथियार के ठिकाने के बारे में एक एक दूसरे को 1992 से बताते आए हैं।  

Shubham Gupta @samacharline