भारत ने बीते वर्षों में डिजिटल इंडिया के माध्यम से अभूतपूर्व र्व प्रगति की है। सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन और ई-गवर्नेंस ने आम नागरिक के जीवन को आसान बनाया है। मोदी सरकार की मंशा रही है कि तकनीक के माध्यम से पारदर्शिर्शिता बढ़े, योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और युवा शक्ति नवाचार व शोध की ओर प्रेरित हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि डिजिटल क्रांति ने भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई है। भारतीय वैज्ञानि कों, तकनीकी संस्थानों और स्टार्ट र्टअप्स ने विश्व स्तर पर अपनी क्षमता सिद्ध की है। आज भारत डिजि टल भुगतान, स्टार्टअप इकोसिस्टम आईटी सेवाओं में अग्रणी देशों में गिना जाता है।
लेकिन इसी प्रगति के बीच एक मौन, गहरी और गंभीर चिंता भी जन्म ले रही है: क्या हम तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, या धीरे-धीरे उसके मानसि क गुलाम बनते जा रहे हैं?
आज शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहाँ मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडि या की पहुँच न हो। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल हाथ में आ जाता है और रात को सोने से पहले भी वही अंति म साथी होता है। हम बि ना सोचे-समझे घंटों स्क्रीन पर समय बिताते हैं। विभिन्न सर्वे र्वेक्षण बताते हैं कि भारत में लोग औसतन प्रतिदिन 6 से 7 घंटे स्क्रीन पर बि ताते हैं। यह समय केवल काम या अध्ययन में नहीं जाता, बल्कि अधि कतर सोशल मीडि या, रील्स, वीडि यो और मनोरंजन में व्यतीत होता है।
यह आँकडा केवल समय का नहीं, हमारी सोच, हमारी प्राथमि कताओं और हमारे जीवन के संतुलन का भी संकेत देता है। पहले परिवारों में शाम को बैठकर बातचीत होती थी। चौपालों पर चर्चा होती थी। ट्रेन में लोग एक-दूसरे से बात करते थे। पार्कों में बुज़र्ग अनुभव साझा करते थे। आज हर व्यक्ति अपने-अपने मोबाइल में खोया हुआ है। पास बैठा व्यक्ति भी दूर लगता है।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत उसका संवाद था: संवाद, सहकार और सौहार्द। आज वही संवाद धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। डिजिटल निर्भरता का सबसे बड़ा प्रभाव हमारे मानसि क और शारीरि क स्वास्थ्य पर दि खाई देता है। चि कि त्सकों और शोधकर्ता ओं के अनुसार, अत्यधि क स्क्रीन टाइम से अवसाद, चिंता, अनिद्रा और तनाव जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं।
कोलंबिया यूनिवर्सिर्सिटी और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे संस्थानों के अध्ययन बताते हैं कि सोशल मीडि या का अत्यधि क उपयोग कि शोरों और युवाओं में मानसिक असंतुलन, आत्मवि श्वास की कमी और सामाजि क अलगाव को जन्म देता है। शारीरिक स्तर पर भी इसके दुष्परिणाम स्पष्ट हैं। कम चलना-फिरना, लंबे समय तक बैठना और देर रात तक स्क्रीन देखने से मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और रक्तचाप जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। जो रोग पहले वृद्धावस्था में होते थे, वे आज युवावस्था में ही दस्तक देने लगे हैं।
यह केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, भविष्य की पीढ़ी की क्षमता का प्रश्न है। इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म र्म पर उपलब्ध सामग्री भी एक गंभीर वि षय है। हिंसा, अश्लीलता, अपसंस्कृति , गाली-गलौज और वि कृत मानसि कता से भरी सामग्री आसानी से बच्चों और युवाओं तक पहुँच रही है। इसका प्रभाव उनके मन, सोच और व्यवहार पर पड़ रहा है। रि श्तों के प्रति संवेदनशीलता कम हो रही है। धैर्य र्य घट रहा है। सहनशीलता कमजोर हो रही है। कभी भारतीय परि वार को ‘प्रथम पाठशाला’ कहा जाता था। दादा-दादी बच्चों को कहानि याँ सुनाते थे, संस्कार देते थे, जीवन के मूल्य समझाते थे। माता-पिता बच्चों के साथ समय बि ताते थे। आज वह भूमि का मोबाइल फोन नि भा रहा है।
दो-तीन साल का बच्चा भी मोबाइल चलाना जानता है। माता-पि ता व्यस्त हैं। बच्चे को मोबाइल पकड़ा दिया जाता है। यही उसकी दुनिया बन जाती है। संयुक्त परिवार की परंपरा, जो भारतीय समाज की रीढ़ थी, धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। बुजुर्गो का अनुभव, मार्ग र्गदर्श र्शन और संस्कार नई पीढ़ी तक नहीं पहुँच पा रहे हैं।
हमारी संस्कृति संयम, संतुलन और त्याग पर आधारि त रही है। सीमि त आवश्यकताएँ, सरल जीवन और सामूहि कता हमारी पहचान थी। आज हमारी आवश्यकताएँ असीमि त हो गई हैं। उपभोग की संस्कृति बढ़ रही है। हम अधिक कमाने, अधिक खर्च करने और अधि क दिखाने की होड़ में फँसते जा रहे हैं।
तकनीक ने इस प्रवृत्ति को और तेज़ कर दिया है।
आज हर प्रश्न का उत्तर गूगल से लि या जाता है। हर नि र्ण र्णय ऐप से होता है। हर दिशा GPS बताता है। हम धीरे-धीरे अपनी सोच, विवेक और निर्णय क्षमता तकनीक को सौंपते जा रहे हैं। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि बुद्धि से ऊपर वि वेक होता है। तकनीक बुद्धि का उत्पाद है, लेकि न वि वेक का वि कल्प नहीं। जब विवेक कमजोर होता है, तब समाज दिशाहीन हो जाता है।
इंटरनेट युग में अध्ययन, साहि त्य, महापुरुषों के वि चार और गहन चिंतन पीछे छूटते जा रहे हैं। कम लोग हैं जो तकनीक का उपयोग आत्मविकास के लिए करते हैं। अधि कतर लोग सतही मनोरंजन में उलझे रहते हैं। शोध बताते हैं कि केवल एक सप्ताह का डिजिटल डिटॉक्स भी मानसिक संतुलन में सुधार ला सकता है। यह दर्शा ता है कि हमारा मस्ति ष्क लगातार डि जि टल उत्तेजना से थक चुका है। विश्व के कई देश इस खतरे को पहचान चुके हैं। फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य देशों में बच्चों के लिए सोशल मीडिया नियंत्रण, स्क्रीन लिमिट और पैरेंटल कंट्रोल पर गंभीर विचार हो रहा है।
भारत में भी इस दिशा में संतुलित नीति की आवश्यकता है — ऐसी नीति जो स्वतंत्रता और जि म्मेदारी दोनों को संतुलित करे। लेकि न नीति से अधि क जरूरी सामाजि क जागरूकता है। माता-पिता को बच्चों के साथ समय बि ताना होगा। शि क्षकों को केवल पाठ्यक्रम नहीं, जीवन मूल्य भी सि खाने होंगे। समाज को संवाद की संस्कृति को पुनर्जी वि त करना होगा।
डिजिटल इंडिया हमारी ताकत है। यह हमारी प्रगति का आधार है। लेकि न यदि हमने संतुलन नहीं बनाया, तो यही ताकत हमारी कमजोरी बन सकती है।
तकनीक साधन है, साध्य नहीं। हमें यह तय करना होगा कि हम तकनीक के मालि क रहेंगे या उसके दास बनेंगे। आज आवश्यकता है आत्ममंथन की। अपने जीवन की गति को थोड़ा धीमा करने की। अपने रिश्तों को फिर से समय देने की। अपने बच्चों को स्क्रीन से बाहर की दुनिया दिखाने की।
डिजिटल युग में भी भारतीय मूल्य, संस्कृति और वि वेक ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी हैं। यदि हम इन्हें बचा पाए, तो तकनीक हमारे लि ए वरदान बनेगी। अन्यथा, हम सुवि धाओं से भरे लेकि न संवेदनहीन समाज में बदलते चले जाएंगे।
यह चुनाव आज हमारे हाथ में है।
– हरिश्चंद्र श्रीवास्तव, प्रवक्ता, भाजपा-उप्र








