देशप्रकाश त्रिवेदी की कलम सेमध्य प्रदेश

चित्रकूट के घाट से मिली भाजपा को सीख,शिवराज अब बदल लो अपनी पुरानी रीत।

सतना। 

सीट कांग्रेस की थी,इसलिए कांग्रेस को ही जीतना थी। चित्रकूट में भाजपा की हार के लिए यह तथ्यों का सरलीकरण है। कांग्रेस प्रकृति की सीट होने से भाजपा हारी है यह कहना भी बहानेबाज़ी है। चित्रकूट में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की प्रचार की पुरानी रीत हारी है,भाजपा के महामंत्री वी.डी. शर्मा की रणनीति हारी है। चित्रकूट की हार ने भाजपा को अपने प्रचार तंत्र और प्रचलित रणनीति पर पुनर्विचार करने का अवसर दिया है। चित्रकूट की हार ने प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया को भी दुरस्त करने की सीख दी है।
गौरतलब है कि चित्रकूट भाजपा और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह के लिए नाक का सवाल था।
मुख्यमंत्री सहित भाजपा के सारे बड़े नेताओं ने चित्रकूट में केम्प किया हुआ था। पार्टी के तेज़तर्रार महामंत्री वी.डी. शर्मा को जीतने की जबाबदारी दी गई थी। वीडी यहाँ चूक गए।
पहले प्रत्याशी चयन में चित्रकूट के कार्यकर्ताओ की भावना का ख्याल नही रखा गया। फिर चुनाव प्रबन्धन में स्थानीय कार्यकर्ताओ ओर नेताओं को तव्वजो नहीं दी गई।
वीडी ने जिन बाहरी कार्यकर्ताओं और नेताओं को बुलाया वे चित्रकूट के घाट पर चंदन लगवाते रहे और कामदगिरि की परिक्रमा करते रहे।
images (7)कांग्रेस ने लोकप्रिय युवा चेहरे को उतारा,दिवंगत विधायक प्रेमसिंह की लोकप्रियता को सहानभूति में बदला, और समर्पित स्थानीय कार्यकर्ताओ की टीम से काम कराया।
विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता अजय सिंह ने कारगर रणनीति बनाई और वे डंके की चोट पर अपने प्रत्याशी को जिताकर लाए।
चित्रकूट की हार से भाजपा चुनाव प्रबन्धन को सबक लेना होगा। प्रचार अभियान और चुनाव प्रबंधन की समीक्षा करनी होगी।
खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को अपने तौर तरीके में बदलाव करना होगा। अपनी भाषण शैली का परिमार्जन करना होगा। जनमानस उनकी शैली और भाषण के कंटेंट से अतिपरिचित हो गया है लिहाजा उनका प्रभाव दिनोंदिन कम होता जा रहा है।
चुनाव प्रबन्धन में भी प्रचार अभियान को नई धार देने की जरूरत है।
सरकार की उपलब्धियों को नवाचार के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए। एकरस प्रचार अभियान की जड़ता को तोड़ना जरूरी है।
उपचुनाव की अपनी प्रकृति होती है,भाजपा के दिग्गज इसके विशेषज्ञ माने जाते थे,सुंदरलाल पटवा,कैलाश जोशी, प्यारेलाल खण्डेलवाल ने कांग्रेस शासन में अनेक उपचुनाव जीते है।
अब भाजपा में चुनाव जीताऊ प्रबन्धको की कमी दिख रही है। दिवंगत अनिल माधव दवे की पूर्ति कर पाना भाजपा के लिए चुनोती है।
बहरहाल कुशल प्रबंधन से कांग्रेस अजय सिंह के नेतृत्व में चित्रकूट के घाट पर फिर काबिज हो गई है। भाजपा को चन्दन लगवाने से आगे की सोचना पड़ेगा।

प्रकाश त्रिवेदी@samacharline.com