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अजरबैजान और आर्मीनिया के बीच छिड़ी जंग में अब तक 150 से ज्यादा नागरिकों की जान जा चुकी है. अजरबैजान में स्थित नागोर्नो-काराबाख में आर्मीनिया के कब्जे वाले इलाके को लेकर दोनों देशों में संघर्ष छिड़ा हुआ है. नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र आधिकारिक तौर पर अजरबैजान का हिस्सा है, लेकिन यहां की आबादी आर्मीनियाई बहुल है. आर्मीनिया ईसाई बहुल है, जबकि अजरबैजान मुस्लिम बहुल देश है.

अजरबैजान और आर्मीनिया की इस लड़ाई में भारतीय आर्मीनिया को समर्थन दे रहे हैं. हालांकि, भारत ने आधिकारिक तौर पर इस मामले में तटस्थता कायम रखी है और दोनों देशों से इलाके में शांति स्थापित करने की अपील की है.

भारत के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है, भारत अजरबैजान-आर्मीनिया के बीच बने हालात को लेकर चिंतित है. इससे क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा को खतरा पैदा होता है. हम दोनों पक्षों से एक-दूसरे के प्रति शत्रुता खत्म करने और संयम बरतने की अपील करते हैं. दोनों देश सीमा पर शांति स्थापित करने के लिए हर संभव कदम उठाएं.

ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटजी पॉलिसी इंस्टिट्यूट के एक पेपर के मुताबिक, टर्किश और पाकिस्तानी जहां सोशल मीडिया पर अजरबैजान का समर्थन कर रहे हैं, वहीं भारतीयों के सोशल मीडिया अकाउंट से आर्मीनिया को समर्थन मिलता दिख रहा है. भारत में सोशल मीडिया पर #IndiaSupportsArmenia के साथ खूब ट्वीट किए जा रहे हैं.

इस पेपर में आगे लिखा गया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर तनाव के बीच टर्किश अकाउंट से पाकिस्तान को समर्थन किया जा रहा था. जब कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया तो भी टर्की के लोगों ने #Pakistanisnotalone हैशटैग के साथ ट्वीट किए. अब नागोर्नो-काराबाख में संघर्ष को लेकर एक नया हैशटैग देखने को मिल रहा है. पाकिस्तानी और टर्किश अपने सोशल मीडिया अकाउंट से हैशटैग #Azerbaijanisnotalone के साथ ट्वीट कर रहे हैं.

एक भारतीय यूजर ने लिखा, भारत के आर्मीनिया और अजरबैजान दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं हालांकि, आर्मीनिया भारत को कश्मीर मुद्दे पर भी समर्थन देता रहा है और आर्मीनिया के पाकिस्तान के साथ भी कूटनीतिक संबंध नहीं हैं. अगर पाकिस्तान और टर्की किसी देश के खिलाफ हैं तो वो देश अपनी जगह पर सही ही होगा. भारत को आर्मीनिया का बेशर्त समर्थन करना चाहिए.

आर्मीनिया में भारत के राजदूत रहे अचल मल्होत्रा ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा कि आर्मीनिया और भारत के ऐतिहासिक रूप से मजबूत रिश्ते रहे हैं. भारत में आर्मीनिया के लोगों की मौजूदगी 8वीं सदी से ही रही है. भारतीय-आर्मीनियन समुदाय के लोगों के लिए कोलकाता कई सालों से घर रहा है. इतिहासकार कोलकाता के विकास और कुछ शैक्षणिक संस्थानों के लिए आर्मीनियन समुदाय के योगदान को भी रेखांकित करते हैं.

इसके अलावा, पाकिस्तान और टर्की का अजरबैजान को समर्थन देना भी भारतीयों के इस रुख की एक वजह है. पाकिस्तान तो लंबे वक्त से भारत के लिए मुश्किलें खड़ी करता रहा है. टर्की भी कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ दे रहा है इसलिए भारत के साथ उसके भी रिश्तों में दरार आई है. कश्मीर मुद्दे पर अजरबैजान का रुख भी भारत विरोधी रहा है.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा, पाकिस्तान अपने दोस्त अजरबैजान के साथ खड़ा है और उसके आत्म-रक्षा के अधिकार का समर्थन करता है. हालांकि, पाकिस्तान की सरकार ने अजरबैजान को सैन्य मदद पहुंचाने की खबरों को खारिज किया है. टर्की ने भी अजरबैजान को समर्थन दिया है. आर्मीनिया ने टर्की पर आरोप लगाया है कि वो अजरबैजान को संघर्ष के लिए भड़का रहा है. टर्की का कहना है कि वह अजरबैजान की क्षेत्रीय संप्रुभता का सम्मान करता है और जब तक आर्मीनिया अजरबैजान के इलाकों से अपना कब्जा नहीं छोड़ देता, वो शांति वार्ता को मान्यता नहीं देगा.

भारतीय आर्मीनिया को सिर्फ वर्चुअली ही सपोर्ट नहीं कर रहे हैं बल्कि जमीन पर मदद भी कर रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंडो-आर्मीनियन फ्रेंडशिप एनजीओ आर्मीनिया की सहायता के लिए डोनेशन भी इकठ्ठा कर रहे हैं.

भारत ने आधिकारिक तौर पर इस संघर्ष में किसी का भी पक्ष नहीं लिया है लेकिन भारत ने आर्मीनिया को हथियारों की आपूर्ति की थी. मार्च महीने में, भारत ने आर्मीनिया के साथ 40 मिलियन डॉलर की डिफेंस डील की थी.

स्पुतनिक के साथ बातचीत में भारत के पूर्व राजदूत अचल मल्होत्रा ने बताया, आर्मीनिया को समर्थन करने का मतलब है कि भारत आत्म-निर्णय के अधिकार का समर्थन कर रहा है. इस संघर्ष में क्षेत्रीय संप्रुभता का मामला है और भारत अगर आर्मीनिया का समर्थन करता है तो कश्मीर को लेकर कूटनीतिक नुकसान झेलने होंगे. हालांकि, पूर्व राजदूत ने कहा कि कश्मीर विवाद आर्मीनिया-अजरबैजान के मामले से काफी अलग भी है. भारत ने कश्मीर के पूर्व राजा हरि सिंह की सहमति से 1948 में इसका विलय किया था जबकि पाकिस्तान ने अवैध तरीके से कश्मीर पर कब्जा कर रखा है. इसके बावजूद, पाकिस्तान और टर्की इस्लामिक सहयोग संगठन में भारत के खिलाफ तमाम मुस्लिम देशों की राय बदलने में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.

भारत के पूर्व राजदूत ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि भारत अजरबैजान की तुलना में आर्मीनिया के ज्यादा करीब रहा है. दोनों देशों के बीच 1992 से ही कूटनीतिक संबंध रहे हैं. 1992 के बाद से भारत की तरफ से राष्ट्रपति स्तर के तीन दौरे हुए. एक 1995 में, दूसरा 2003 में और तीसरा 2017 में. विदेश मंत्री के स्तर पर भी भारत की तरफ से (2000, 2006, 2010) तीन दौरे हुए हैं.

भारत के दो उप-राष्ट्रपति भी आर्मीनिया के दौरे पर गए थे. दूसरी तरफ, भारत और अजरबैजान के बीच कभी भी शीर्ष स्तर के नेता का कोई दौरा नहीं हुआ. लेकिन कूटनीतिक रूप से आर्मीनिया के करीब होने के बावजूद भारत किसी एक का पक्ष लेने की स्थिति में नहीं है.