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केंद्र सरकार एक बार फिर राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगाने से बच रही है और कोशिश यह है कि जिन राज्यों में कोरोना के ज्यादा केसेज आ रहे हैं, वहां राज्य सरकारें अपने स्तर पर सीमित लॉकडाउन लगाएं. इसकी कुछ राजनीतिक वजहें हो सकती हैं, लेकिन सबसे बड़ी चिंता इकोनॉमी को लेकर है.

कोरोना के रिकॉर्ड संख्या में बढ़ते मामलों की वजह से दिल्ली और महाराष्ट्र में आंशिक लॉकडाउन लगा चुका है. लेकिन केंद्र सरकार इस बार देशव्यापी लॉकडाउन लगाने से बच रही है. इस बार यह जिम्मा राज्यों पर छोड़ दिया गया है. इसकी कुछ राजनीतिक वजहें हो सकती हैं, लेकिन मुख्य वजहें अर्थव्यवस्था से जुड़ी हैं. सबसे बड़ी चिंता इकोनॉमी को लेकर है.

जीडीपी में आ सकती है भारी गिरावट

गौरतलब ​है कि पिछले साल मार्च में जब केंद्र सरकार ने लॉकडाउन लगाया था तो इसका अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ था. वित्त वर्ष 2021 की जून में खत्म होने वाली पहली तिमाही में जीडीपी में करीब 24 फीसदी की रिकार्ड गिरावट आई थी. इसके बाद सितंबर की तिमाही में भी इकोनॉमी में 7.5 फीसदी की नेगेटिव ग्रोथ यानी गिरावट आई थी. इस तरह से हमारी अर्थव्यवस्था तकनीकी रूप से मंदी के दौर में चली गई थी. इसे सुधरने में नौ महीने लग गए और तीसरी तिमाही में इसमें 0.4 फीसदी की मामूली बढ़त हुई.

इस भयावह अनुभव को देखते हुए ही शायद केंद्र सरकार एक बार फिर राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगाने से बच रही है और कोशिश यह है कि जिन राज्यों में कोरोना के ज्यादा केसेज आ रहे हैं, वहां राज्य सरकारें अपने स्तर पर सीमित लॉकडाउन लगाएं.

कोरोना की दूसरी लहर के आते ही कई एजेंसियों ने वित्त वर्ष 2021-22 में भारत की जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को घटा दिया है. जापानी ब्रोकरेज फर्म नोमुरा ने अपने अनुमान को 13.5% से घटाकर 12.6% कर दिया है.

रेटिंग एजेंसी केयर रेटिंग ने हाल में यह अनुमान जाहिर किया था कि महाराष्ट्र के आंशिक लॉकडाउन से ही इकोनॉमी को करीब 40,000 करोड़ रुपये का झटका लगेगा और व्यापार, होटल एवं ट्रांसपोर्ट सेक्टर को सबसे ज्यादा नुकसान होगा. केयर ने भी जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 10.9 से घटाकर 10.7 फीसदी कर दिया है. कहा जा रहा है कि महाराष्ट्र का देश की जीडीपी में करीब 15 फीसदी योगदान है और वहां की आंशिक बंदी से ही इस बात का जोखिम है कि लोगों का पारिवारिक खर्च काफी घट जाए. इसे देखते हुए कंपनियां उत्पादन सुस्त करने को मजबूर हो सकती हैं.

ये सेक्टर हो जाते हैं तबाह

पिछले लॉकडाउन से ट्रैवल, एंटरटेनमेंट, रिटेल, मॉल, टैक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबिल, ट्रांसपोर्ट सेक्टर जैसे कई सेक्टर बर्बाद हो गए थे. इन सेक्टर का कामकाज महीनों तक ठप रहा. हाल के महीनों में बड़ी मुश्किल से इनका पहिया गति पकड़ रहा था. ऑटो सेक्टर की बिक्री में भी काफी सुधार देखा गया था. होटल, रेस्टोरेंट, सिनेमाहॉल, मॉल खुल गए थे. भीड़ न सही, लेकिन कुछ ग्राहक दिखने लगे थे. इन सेक्टर में लॉकडाउन के बाद बड़े पैमाने पर छंटनी हुई थी. अब अगर फिर से पूरी तरह से लॉकडाउन लगा, तो जिन लोगों को काम पर वापस बुलाया गया है वे फिर बेरोजगार हो जाएंगे और इन सेक्टर्स की तो पूरी तरह से कमर ही टूट जाएगी.

बैंकिंग पर भी गहरा असर

लॉकडाउन का बैकिंग पर भी गहरा असर होता है. पिछले लॉकडाउन में हमने देखा था कि जब सारे कल-कारखाने, काम-धंधे बंद हो गए तो लोग लोन की ईएमआई का डिफॉल्ट करने लगे. इसकी वजह से रिजर्व बैंक ने बैंकों को यह निर्देश दिया कि लोगों को लोन ईएमआई पर छह महीने का मोरेटोरियम दिया जाए, यानी चुकाने की मोहलत दी जाए. इसका बैंकों को भारी बोझ पड़ा. पिछले एक साल के दौरान बैंकों के एनपीए में भी काफी बढ़त हुई.

मजदूरों का पलायन और बेरोजगारी

लॉकडाउन की वजह से बड़े पैमाने पर कारखाना श्रमिक, रोज कमाने-खाने वाले लोग बेरोजगार हो जाते हैं. पिछले लॉकडाउन में हर शहर से हजारों की संख्या में मजदूर इसकी वजह से अपने गांव की ओर चल पड़े थे. इससे सरकार की बदनामी तो हुई ही, कोरोना संक्रमण के प्रसार पर अंकुश लगाने में भी मुश्किल आई. पिछले साल इसकी वजह से बेरोजगारी दर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई और रोजगार बाजार सुधरने में कई महीने लग गए. अब जब बड़ी मुश्किल से इसमें सुधार हुआ है, तो एक बार फिर से सरकार पहले जैसे हालात नहीं करना चाहती.

टैक्स कलेक्शन और राहत पैकेज

लॉकडाउन का गहरा असर केंद्र और राज्य सरकारों के खजाने पर पड़ा था. केंद्र सरकार के टैक्स कलेक्शन में तो भारी कमी आई ही, राज्यों के पास तो खर्च चलाने के लिए पैसे की तंगी हो गई थी. इसीलिए जीएसटी के बकाये को लेकर केंद्र और राज्यों में काफी विवाद हुआ था.

दूसरी तरफ, खजाने की तंगी के बावजूद सरकार को सबसे ज्यादा पीड़ित लोगों, सेक्टर को राहत देने के लिए करीब 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज का ऐलान करना पड़ा था. सरकार शायद अब ऐसा नहीं चाहती कि एक बार फिर ऐसे किसी दोहरे बोझ का सामना करना पड़े.