Free and fair elections in Viksit Bharat -Aditya Trivedi
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‘जगदम्बा की जय हो!’ ये वही शब्द थे, जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान एक घायल, लेकिन दृढ़निश्चयी और साहसी द्वितीय लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने कहे थे, जब वह लगी चोटों की परवाह न करते हुए पाकिस्तानी युद्धक टैंकों को नष्ट करने के लिए आगे बढ़े थे।
जयपुर: ‘जगदम्बा की जय हो!’ ये वही शब्द थे, जो’ के दौरान एक घायल, लेकिन दृढ़निश्चयी और साहसी द्वितीय लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने कहे थे, जब वह लगी चोटों की परवाह न करते हुए पाकिस्तानी युद्धक टैंकों को नष्ट करने के लिए आगे बढ़े थे। खेत्रपाल के फेमागुस्टा नाम के टैंक के चालक रहे रिसालदार प्रयाग सिंह ने आईएएनएस से बातचीत के दौरान युद्ध के आखिरी दिन की जानकारी साझा की। उन्होंने कहा, खेत्रपाल मां जगदंबा के भक्त थे और उन्होंने प्रेरणा देने के लिए ये नारे लगाए।
21 साल के अरुण ने युद्ध की सारी बारीकियां भी नहीं सीखी थी लेकिन अपने अफसरों से लड़कर उसने युद्ध में जाने की बात मनवाई। उनके साहस को देखकर पाकिस्तानी अफसर भी सैल्यूट करने लगे थे। वो लड़का जिसने अपनी आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी और फिर परमवीर बन गया। आज ही के दिन यानी कि 16 दिसंबर 1971 को भारत ने को धूल चटाकर बांग्लादेश को जीत दिलाई थी लेकिन इसी दिन भारत ने अपने इस सपूत को भी खो दिया था। अरुण के अदम्य साहस और पराक्रम की चर्चा किए बगैर 1971 की जंग की बात करना अधूरा होगा। अरुण ने लड़ाई में पंजाब-जम्मू सेक्टर के शकरगढ़ में शत्रु सेना के 10 टैंक नष्ट किए थे। सिर्फ 21 साल की उम्र में उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया था। उनका जन्म 14 अक्टूबर, 1950 को हुआ था।
युद्ध की कहानी बताते हुए सिंह ने कहा, 17 पूना हॉर्स को 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान 47वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड की कमान सौंपी गई थी, जो शकरगढ़ सेक्टर में बसंतर की लड़ाई में शामिल था। ब्रिगेड को बसंतर नदी के पार एक ब्रिजहेड का निर्माण करना था। 15 दिसंबर को पूना हॉर्स के टैंकों की तैनाती को रोकने के लिए दुश्मन द्वारा व्यापक खदानों से भरे जाने के बावजूद इसने अपने लक्ष्य पर कब्जा कर लिया। सिंह ने कहा, यह 17 हॉर्स, 4 हॉर्स (दो बख्तरबंद रेजिमेंट), 16 मद्रास और 3 ग्रेनेडियर्स द्वारा एक संयुक्त ऑपरेशन था। इंजीनियरों ने खदानों को आधा साफ कर दिया, जबकि भारतीय सैनिकों ने दुश्मन के कवच की खतरनाक गतिविधि को भांपते हुए इस मोड़ पर 17 पूना हॉर्स ने माइनफील्ड से आगे बढ़ने का फैसला किया।
16 दिसंबर को, पाकिस्तानी कवच ने अपना पहला जवाबी हमला शुरू किया। स्क्वाड्रन के कमांडर ने तुरंत सुदृढ़ीकरण के लिए बुलाया। दूसरे लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने अपने बाकी रेजिमेंट के साथ तुरंत प्रतिक्रिया दी और एक क्रूर जवाबी हमला शुरू किया।
वह अपने टैंकों के साथ दुश्मन की अग्रिम को सफलतापूर्वक वश में करने में सक्षम थे। हालांकि, लड़ाई के दौरान दूसरे टैंक का कमांडर घायल हो गया। प्रभारी के रूप में खेत्रपाल ने दुश्मन पर अपना हमला जारी रखा। हालांकि, दुश्मन बड़ी संख्या में हताहत होने के बावजूद पीछे नहीं हटा। खेत्रपाल ने आने वाले पाकिस्तानी सैनिकों और टैंकों पर हमला किया, इस प्रक्रिया में दुश्मन के टैंक को नीचे गिराया। हालांकि, पाकिस्तानी सेना ने जवाबी हमला किया। आगामी टैंक युद्ध में खेत्रपाल ने दो शेष टैंकों के साथ अपनी जमीन पर कब्जा कर लिया और दुश्मन के 10 टैंकों को नष्ट कर दिया।
सिंह ने कहा, हालांकि टैंकों की भीषण लड़ाई के दौरान खेत्रपाल का टैंक दुश्मन की आग की चपेट में आ गया था, लेकिन उन्होंने टैंक को नहीं छोड़ा.. इसके बजाय, वह लड़ते रहे। टैंक में आग लग गई और उनके पैर जख्मी हो गए। मैं टैंक पर चढ़ गया और आग बुझा दी। लेकिन इस बीच, वह शहीद हो गए।