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बसपा प्रमुख मायावती ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के खिलाफ सामान्य सीट होने के बाद भी दलित प्रत्याशी उतारे हैं. बसपा ने करहल सीट पर कुलदीप नारायन और जसवंतनगर सीट पर ब्रजेंद्र प्रताप सिंह को टिकट दिया है. पिछली बार इन दोनों ही सीटों पर दलित वोटों के बीजेपी में जाने से बसपा तीसरे नंबर पर रही थी. इसीलिए मायावती ने दलित कार्ड खेला है?
उत्तर प्रदेश की सियासत में पहली बार सपा प्रमुख अखिलेश यादव विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाने के लिए मैनपुरी जिले की करहल सीट से उतरे हैं. अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव अपनी परंपरागत जसवंतनगर सीट से एक बार फिर से चुनावी मैदान में हैं. बसपा प्रमुख मायावती ने अखिलेश और शिवपाल के खिलाफ दलित उम्मीदवार उतारा है. ऐसे में सवाल उठता है कि सामान्य सीट होते हुए भी मायावती ने चाचा-भतीजे के खिलाफ दलित प्रत्याशी उतारकर क्या सियासी दांव चला है?
मायावती ने गुरुवार को अपने 53 उम्मीदवारों की एक लिस्ट जारी की है. इसमें सपा प्रमुख अखिलेश यादव की करहल सीट पर कुलदीप नारायण और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव की जसवंतनगर सीट पर ब्रजेंद्र प्रताप सिंह को प्रत्याशी बनाया गया है. बसपा ने दोनों ही सीटों पर दलित प्रत्याशी दिए हैं जबकि इन सीटों से सामान्य और ओबीसी नेता को भी उतारा जा सकता था. इसके बावजूद मायावती ने दलित कार्ड चला है.
बता दें कि 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने करहल में एक सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार दलवीर को मैदान में उतारा था. दलवीर 14.18 प्रतिशत मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे. जसवंतनगर में, बसपा ने तब ओबीसी दुर्वेश कुमार शाक्य को मैदान में उतारा था, जो भी 10.58 प्रतिशत मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे. वहीं, बीजेपी ने दोनों ही सीट पर पिछली बार ओबीसी उतारे थे. बीजेपी ने जसवंतनगर सीट पर यादव और करहल सीट पर शाक्य समुदाय के प्रत्याशी उतारे थे.
करहल और जसवंतनगर दोनों सीटों पर यादवों का दबदबा है, लेकिन दलित वोटर भी काफी बड़ी संख्या में है. 2017 में भी बीजेपी को दलितों का वोट मिला था और दोनों सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी. ऐसे में बसपा के एक सीट पर सामान्य और एक सीट पर ओबीसी प्रत्याशी होने से वो तीसरी नंबर रही थी. इसी सियासी समीकरण को देखते हुए मायावती ने अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को खड़ा करके बसपा ने अखिलेश-शिवपाल की राह को भले की आसान बना दिया, लेकिन बीजेपी के लिए अब मुकाबला कठिन हो गया है.
करहल के सियासी समीकरण को देखते हुए अखिलेश यादव के लिए काफी सेफ सीट मानी जा रही है. ऐसे ही जसवंतनगर भी शिवपाल यादव के लिए काफी सुरक्षित सीट मानी जाती है. सपा का दोनों ही सीटों पर दबदबा रहा है. यादव बहुल होने की वजह से यहां पर यादव बनाम दलित की सियासत शुरू से रही है. बसपा यहां दलित और गैर-यादव ओबीसी के जरिए सियासी दखल देती रही है तो बीजेपी ने भी सवर्ण और ओबीसी वोटों के दम पर पिछले चुनाव में एक बड़ी चुनौती पेश किया था.
बीजेपी इस फॉर्मूले के जरिए करहल और जसवंतनगर सीट प्रत्याशी की तलाश कर रही थी. बीजेपी सूत्रों की मानें तो पार्टी ने करहल सीट पर यादव समाज से एक कैंडिडेट का नाम शॉर्टलिस्ट किया गया था, लेकिन अखिलेश के चुनाव लड़ने के ऐलान केबाद पार्टी ने दोबारा से कैंडिडेट पर मंथन शुरू कर दिया है ताकि सपा प्रमुख को कड़ी चुनौती दी सके.
वहीं, जसंवतनगर सीट पर शिवपाल के खिलाफ पिछले दो चुनाव से लड़ रहे मनीष यादव ने स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ सपा में शामिल हो गए हैं. मनीष 2012 में बसपा और 2017 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े थे और दोनों ही बार दूसरे नंबर पर रहे थे. मनीष यादव के जाने के बाद बीजेपी मजबूत कैंडिडेट पर दांव खेलने की रणनीति बना रही है.
बीजेपी की की रणनीति है कि चाचा-भतीजे के खिलाफ मजबूत प्रत्याशी उतारकर सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी के साथ-साथ दलित वोटों को एकजुटकर सपा को उसके घर में ही घेरा जाए. बीजेपी के दांव खेलने से पहले बसपा प्रमुख मायावती ने जिस तरह से दोनों ही सीटों पर दलित प्रत्याशी उतार दिए हैं. उससे सपा के लिए दोनों ही सीटों पर एक तरह से वाकओवर माना जा रहा है.