मध्यप्रदेश विधानसभा में संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार के बीच की शाब्दिक तल्खी और भाव भंगिमा ने संसदीय परम्परा में मतभेद और मनभेद के महीन अंतर को समाप्त कर दिया है। संसदीय कार्यवाही और परस्पर बयानबाजी से मतान्तर,मनान्तर के स्तर पर आ गए। औकात और देख लेगें जैसे शब्दों ने विधायी शब्दावली को लज्जित कर दिया।
बीते एक दशक में देश की संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही में गुणवत्ता,गरिमा और आचरण के स्तर पर कमी आई है। संसदीय सत्रों की अवधि भी कम हुई है,लोकहित के विषयों पर चर्चा लगभग खत्म हो गई है,विधायी कार्यो में मुद्दे के स्थान पर चुहलबाजी,टिप्पणीयां,रस्साकसी,अध्यक्ष की आसंदी का असम्मान, नारेबाजी,बहिर्गमन जैसे उपकरण ही मीडिया में स्थान पाते है। संसदीय गरिमा के साथ संसदीय पत्रकारिता भी छपास और दिग्दर्शन के जाल में उलझ गई है।
90 के दशक में और इससे आगे तक विधानसभा सत्र लंबे होते थे,खूब चर्चाएं होती थी,सकारात्मक बहस होती थी,प्रश्न उठाए जाते थे,ध्यानाकर्षण को गंभीर माना जाता था। स्वस्थ्य संसदीय परम्परा के लिए मध्यप्रदेश की विधानसभा जानी जाती थी। पता नही किसकी नज़र मध्यप्रदेश विधानसभा को लग गई हैं, पिछले कई सालों से कोई भी सत्र बगैर विवाद के नही निपटा है। अरसे से विधानसभा में उपाध्यक्ष नही है,पक्ष और विपक्ष की विधायी कार्यों में रुचि घटती जा रही है।
विधानसभा के प्रबोधन कार्यक्रम में गिनती ले विधायक आते है कोई सीखना हो नही चाहता। जब विधानसभा में कार्यवाही का स्तर गिरा तो सरकार और प्रशासन ने भी उसे गंभीरता से लेना छोड़ दिया। प्रश्नों के आधे-अधूरे जबाब आते है,मंत्री तैयारी नही करते है,विषयो के प्रति उदासीनता दिखाई देती है।
बज़ट सत्र को लंबा चलाना सरकार की मजबूरी है,विधानसभा ही सरकार के खर्चो को स्वीकृति देती है,इसलिए बज़ट पेश करना,उस चर्चा करना और उसे पास कराना सरकार के लिए अनिवार्य है,अन्यथा यह स्त्र भी अवसान की और चला जाता।
बहरहाल निराशा तो है, पर उम्मीद है इसी में लोकतंत्र की आभा भी प्रकाशवान होगी।

लेखक -प्रकाश त्रिवेदी
संपादक : समाचारलाइन डॉट कॉम








