वन अधिकारी केवल प्रशासनिक अधिकारी नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रहरी हैं: मुख्यमंत्री
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अक्षय जैन। भारत का बाजार तेजी से बदल रहा है। मोबाइल पर सामान देखना, घर बैठे खरीदारी करना और कुछ ही समय में सामान घर पहुंच जाना अब आम बात हो गई है। ऑनलाइन कारोबार ने ग्राहकों के लिए सुविधा बढ़ाई है, लेकिन इसका असर परंपरागत छोटे और मझले दुकानदारों पर साफ दिखाई देने लगा है।
आज देश का फुटकर व्यापारी गहरी मंदी से जूझ रहा है। दुकान का किराया, बिजली का बिल, कर्मचारियों की तनख्वाह, माल की लागत और दूसरे खर्च लगातार बने हुए हैं, लेकिन ग्राहक पहले की तरह दुकान पर नहीं आ रहा। कई दुकानदारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि दुकान का खर्च कैसे निकले और परिवार कैसे चले?
ऑनलाइन कारोबार से मुकाबला करना छोटे दुकानदार के लिए आसान नहीं है। बड़ी ऑनलाइन कंपनियां बड़े स्तर पर कारोबार करती हैं। वे तरह-तरह की छूट देती हैं और सामान घर तक पहुंचाती हैं। इसके सामने मोहल्ले और बाजार की छोटी दुकान खड़ी है, जहां दुकानदार अपनी पूरी पूंजी लगाकर माल रखता है और ग्राहक का इंतजार करता है।
यहां सवाल ऑनलाइन कारोबार को बंद करने का नहीं है। समय के साथ व्यापार का तरीका बदलना जरूरी है। लेकिन सवाल यह जरूर है कि क्या छोटे दुकानदार को भी बदलते बाजार में आगे बढ़ने का मौका दिया जा रहा है?
सरकार व्यापारियों को डिजिटल कारोबार से जोड़ने की बात करती है। यह अच्छी पहल है, लेकिन केवल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जोड़ देना ही समाधान नहीं है। छोटे व्यापारी को आसान कर्ज, कम खर्च में डिजिटल सुविधा, ऑनलाइन बिक्री की जानकारी और बड़ी कंपनियों के साथ बराबरी का मौका भी मिलना चाहिए।
देश में छोटे और मझले दुकानदारों की संख्या बहुत बड़ी है। यही व्यापारी बाजार को रोज चलाता है। सुबह दुकान खोलने से लेकर रात दुकान बंद करने तक वह मेहनत करता है। वह सिर्फ अपना परिवार नहीं पालता, बल्कि कर्मचारी, माल सप्लायर और कई दूसरे लोगों के रोजगार से भी जुड़ा होता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि व्यापारी अपनी परेशानी को लेकर अक्सर सड़क पर आंदोलन नहीं करता। किसान अपनी मांग के लिए आंदोलन करता है। छात्र अपनी समस्या को लेकर आवाज उठाते हैं। कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं। लेकिन व्यापारी अक्सर नुकसान सहकर भी चुपचाप अपनी दुकान खोलता है और अगले दिन फिर कारोबार शुरू कर देता है।
क्या उसकी चुप्पी को उसकी मजबूरी समझ लिया गया है?
लोकसभा में 543 सांसद हैं। चुनाव के समय व्यापारी वर्ग हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। व्यापारियों का परिवार, उनका सामाजिक संपर्क और उनका बाजार से जुड़ा नेटवर्क चुनाव में भी बड़ी भूमिका निभाता है। लेकिन चुनाव के बाद यही व्यापारी जब मंदी, महंगाई और ऑनलाइन कारोबार की मार से परेशान होता है तो उसकी आवाज उतनी मजबूती से क्यों नहीं सुनी जाती?
व्यापारी सरकार को टैक्स देता है। बाजार को चलाता है। रोजगार देता है। देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान देता है। फिर जब उसका कारोबार कमजोर पड़ रहा है तो उसकी चिंता भी उतनी ही जरूरी होनी चाहिए।
सरकार को छोटे और मझले व्यापारियों के लिए अलग से मजबूत योजना बनानी चाहिए। उन्हें आसान ब्याज पर पैसा मिले। कारोबार के नियम आसान हों। डिजिटल व्यापार में उन्हें भी जगह मिले। ऑनलाइन और दुकान वाले व्यापार के बीच स्वस्थ मुकाबला हो। स्थानीय बाजारों को बेहतर बनाया जाए और ग्राहकों को बाजार तक लाने के लिए सुविधाएं बढ़ाई जाएं।
क्योंकि एक दुकान बंद होना केवल एक दुकानदार का नुकसान नहीं है। उसके साथ एक परिवार की आमदनी, कर्मचारियों की नौकरी और कई दूसरे लोगों का काम भी प्रभावित होता है।
भारत डिजिटल जरूर बने, ऑनलाइन कारोबार भी बढ़े, लेकिन इसके साथ देश की पारंपरिक दुकानें भी बचनी चाहिए। आखिर यही छोटी दुकानें वर्षों से भारत के बाजार की पहचान रही हैं।
व्यापारी को भीख नहीं चाहिए। उसे बराबरी का मौका चाहिए।
वह सरकार से केवल इतना पूछ रहा है
“हमने हर मुश्किल समय में देश की अर्थव्यवस्था का साथ दिया। अब जब हम मुश्किल में हैं, तो सरकार हमारा साथ कब देगी?”
मंदी की मार झेल रहा व्यापारी आखिर कब तक चुपचाप सहता रहेगा?