पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने एक सप्ताह में दो बार कैंसर मरीजों की दवाई की सरकारी कीमत से 10 से 38 गुना अधिक कीमत पर बाजार में बेचनेे पर सख्त नाराजगी जताई और अनेक सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 22 सितम्बर 2026 को 2700 रूपए की कीमत की कैंसर की दवाई की एमआरपी 27 हजार रूपए होने पर इसे मरीजों के साथ दिनदहाड़े डकैती निरूपित किया। उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी पर भी अनेक सवाल उठाए।
इसी प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने एक सप्ताह में दूसरी बार 29 सितम्बर को कंैसर दवाईयों पर सरकारी खरीदी के 10 गुना अधिक कीमत पर सवाल उठाते हुए इसे कत्लेआम कहा। उन्होंने यह भी कहा कि ईलाज सेवा की बजाय कमाई का करोबार बन रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में केन्द्र से जवाब भी तलब किया।
जब विधायिका और कार्यपालिका अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियों का भलीं भांति निर्वहन नहीं करती है तो सुप्रीम कोर्ट को दखल देना ही पड़ता है ! इसके पिछले अनेक उदाहरण साक्षी हैं। लाचार, बेबस और मौत से लड़ रहे कैंसर मरीजों के पक्ष में एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट सामने आ खड़ा हुआ है।
मीडिया की खबरों के अनुसार कैंसर की दस दवाईयों की सरकारी खरीदी और एमआरपी पर जानकारी जुटाई गई तो अनेक चैंकाने वाले परिणाम सामने आए। कैंसर की एक दवाई 38 गुना अधिक कीमत पर बेची जाने की खबर ने सबको चैंका दिया। दूसरी दवाई भी करीब 37 गुना अधिक कीमत पर बेची जा रही थी। इसी प्रकार तीसरी दवाई करीब 24 गुना, चैथी दवाई 20 गुना और पाँचवी दवाई 19 गुना अधिक कीमत पर बेचा जाना पाया गया।
इसी प्रकार छठी दवाई 16 गुना, सातवीं दवाई 11 गुना और आठवीं दवाई 10 गुना अधिक कीमत पर बेचा जाना पाया गया। नौंवी दवाई 7 गुना और दसवी दवाई सरकारी खरीद से 3 गुना अधिक एमआरपी पर बेची जा रही थी। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि कैंसर की जो दवाई सरकार को 333 रूपए में कंपनी द्वारा बेची जाती है, वही दवाई की कीमत और उसकी एमआरपी 12,500 रूपए होती है। दवाई कंपनियों ने बेतहाशा लूट मचा रखी है। इतना ही नहीं अलग-अलग कंपनियों और ब्रांड की एमआरपी भी अलग-अलग पाई गई।
जब सरकार अपने सरकारी अस्पतालों के लिए कैंसर दवाईयां खरीदती है तो वह थोक में लेती है। इसलिए उसे दवाई बनाने वाली कंपनियों से कम कीमत पर दवाई मिलती है। यहाँ सवाल यह उठता है कि जब कंपनियां संस्थागत खरीदी में कैंसर की दवाईयाँ इतनी कम कीमत पर दे सकती है तो उस ब्रांड की एमआरपी कई गुना अधिक दर पर बेबस कैंसर मरीज को क्यों बेची जाती है ?
नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथाॅरिटी द्वारा 42 नाॅन शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं का पेड मार्जिन अधिकतम 30 प्रतिशत किया तो इससे 500 से अधिक ब्रांड की कीमतेें घट गई। लेकिन सभी कैंसर की दवाईयां इसके दायरे में नहीं होने के कारण दवाई बनाने वाली कंपनियाँ मनमाने एमआरपी पर दवाईयाँ बेचकर लूट मचा रही है। इससे कैंसर का मरीज मजबूरी में कई गुना अधिक एमआरपी वाली दवाई खरीदता है और ठगा जाता है।
टाटा मेमोरियल ट्रस्ट की अगुवाई वाले नेशनल कैंसर ग्रीड ने शुरूआत में 23 अस्पतालों के लिए कैंसर की 40 प्रमुख दवाईयाँ सामूहिक रूप से खरीदी। कंपनियों ने उन दवाईयों की एमआरपी पर औसतन 82 प्रतिशत छूट दी। इससे 1320 करोड़ से ज्यादा की बचत हुई। अब इस ग्रीड में करीब 400 अस्पताल शामिल है।
अब यहां सवाल यह उठता है कि सरकारी खरीदी और नेशनल कैंसर ग्रीड द्वारा जब थोक में कैंसर की दवाईयाँ खरीदी जाती है तो उन्हें काफी छूट मिल जाती है। किन्तु मौत से लड़ रहे मरीजों को यह छूट नसीब नहीं होती ! कैंसर मरीजों के सामने ये चुनौती रहती है कि वह कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से लड़े या उसकी कीमत से ?
केन्द्र सरकार द्वारा कुछ वर्षों पूर्व प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना के अन्तर्गत सरकारी अस्पतालों मंे सस्ती जेनरिक दवाईयाँ बेची जाने के लिए अनेक मेडिकल स्टोर शुरू किए हैं। इसके साथ ही निजी मेडिकल स्टोरों पर भी सस्ती जेनरिक दवाईयां बेची जाने की व्यवस्था की गई है। इसलिए इस परियोजना के अन्तर्गत कैंसर की सभी सस्ती जेनरिक दवाईयां भी बनवाकर उसे उक्त मेडिकल स्टोरों से बेचे जाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसके साथ ही सभी सरकारी अस्पतालों में सस्ती जेनरिक दवाईयाँ दी जाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इससे कैंसर मरीजों को कई गुना अधिक एमआरपी पर बेचने वाली दवाईयों की कंपनियों पर नकेल कसी जा सकेगी।
कैंसर मरीजों के हक में जहाँ सुप्रीम कोर्ट सामने आ गया है, वहीं सरकार को भी कैंसर मरीजों के हित में कैंसर की सभी दवाईयों की कीमत पर सख्त नियंत्रण लागू करना चाहिए। इसके लिए जरूरत हो तो कानून में भी परिवर्तन किया जाए। किन्तु कैंसर मरीजों को दवाईयाँ सस्ती मिलनी ही चाहिए, ताकि वे मौत से लड़ने के साथ-साथ दवाईयों की कीमत से लड़ने से बच सकेंगे।