लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही वायुसेना? फेज आउट नहीं हो रहे मिग-21 - Samacharline.com

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लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही वायुसेना? फेज आउट नहीं हो रहे मिग-21

सूत्रों के अनुसार, वायुसेना में शीर्ष स्तर पर मिग-21 विमानों को फेज आउट करने की योजना बनी थी। 2014, 2017, 2019 तथा 2021 में इन्हें फेज आउट किए जाने की बातें हुईं लेकिन अभी तक इस्तेमाल जारी है।

क्या वायुसेना लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही है जिसके चलते छह दशक पुराने मिग-21 उसकी मजबूरी बने हुए हैं। एक दिन पहले बाड़मेर में मिग-21 के दुर्घटनाग्रस्त होने और उसमें दो पायलटों की मृत्यु के बाद यह सवाल फिर से उठने लगा है। वायुसेना में मिग-21 के करीब दस साल बाद शामिल किए गए मिग-27 विमानों को फेज आउट किया जा चुका है। लेकिन मिग-21 अभी भी उड़ान भर रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, वायुसेना में शीर्ष स्तर पर मिग-21 विमानों को फेज आउट करने की योजना बनी थी। 2014, 2017, 2019 तथा 2021 में इन्हें फेज आउट किए जाने की बातें हुईं लेकिन अभी तक इस्तेमाल जारी है। अब 2025 तक इसे चरणबद्ध तरीके से फेज आउट किया जाएगा।

वायुसेना के सूत्रों के अनुसार, अभी भी मिग-21 की चार स्क्वाड्रन बची हुई हैं जिनमें 65 लड़ाकू विमान तथा कुछ दो सीट वाले ट्रेनर विमान हैं। हादसे का शिकार हुआ है विमान भी ट्रेनर था। यदि अपग्रेड किए हुए मिग-21 बाइसन विमानों को भी जोड़ लें तो करीब सवा सौ विमान हैं।

तो चार स्क्वाड्रन कम हो जाएगी
वायुसेना मिग विमानों को हटाने का फैसला लेती है तो सीधे उसकी चार स्क्वाड्रन कम हो जाएगी। अभी 32 स्क्वाड्रन हैं जबकि 42 होनी चाहिए। 2001-02 के दौरान वायुसेना ने 42 स्क्वाड्रन पूरी कर ली थी। एक स्क्वाड्रन में 18 लड़ाकू विमान होते हैं। यानी 10 स्क्वाड्रन (180 लड़ाकू विमान) की तत्काल जरूरत है।

पांच नई स्क्वाड्रन बनी
पिछले एक दशक में वायुसेना की पांच नई स्क्वाड्रन बनी हैं। इनमें तीन राफेल तथा दो एलसीए तेजस की हैं। सवाल सिर्फ मिग-21 विमानों को फेज आउट करने का नहीं, बल्कि मिराज-जगुआर भी पुराने हो चुके हैं। वायुसेना के पास 49 मिराज तथा 139 जगुआर हैं। उन्हें अपग्रेड करने की योजना है लेकिन उस पर भारी भरकम खर्च आ रहा है। बेहतर समझ यह कहती है कि उन्हें अपग्रेड करने की बजाय नए खरीदे जाएं। लेकिन निर्णय नहीं हो पा रहा है।

1963 में किया गया था शामिल
मिग-21 विमानों को वायुसेना में 1963 में शामिल किया गया था और विभिन्न किस्म के करीब 900 विमान वायुसेना में शामिल किए गए। करीब आधे विमान तकनीक हस्तांतरण के जरिये एचएएल में बनाए गए थे। इनमें से करीब 400 दुर्घटनाग्रस्त हुए जिनमें करीब दो सौ पायलटों की मृत्यु हुई तथा 50 नागरिक भी मारे गए। बार-बार के हादसों के चलते इन्हें उड़ता ताबूत कहा जाने लगा।

अधिग्रहण से फंसा पेच
वायुसेना के पूर्व प्रमुख बीएस धनोआ भी मानते हैं कि नए विमानों का अधिग्रहण नहीं हो पाने के कारण वायुसेना इन्हें हटा नहीं पा रही है। हालांकि, वह मानते हैं कि जो भी विमान वायुसेना इस्तेमाल करती है, वह पूरी तरह से सेवा के योग्य होता है। नई तकनीक ज्यादा सुरक्षित है। उनके अनुसार मिग विमानों की कुल संख्या ज्यादा होने के कारण ही हादसे भी ज्यादा हुए हैं। हालांकि, अपग्रेडेड मिग-21 बाइसन ने कई मौकों पर शानदार प्रदर्शन भी किया है। अभिनंदन ने इसी से पाक के एफ-16 को उड़ाया था।

नए विमानों की खरीद
वायुसेना ने 83 स्वदेशी तेजस और खरीदने का ऑर्डर दिया हुआ है तथा 114 मल्टी मल्टीरोल विमानों की खरीद की प्रक्रिया शुरू की है। लेकिन इन्हें हासिल करने में अभी लंबा वक्त लगना तय है।

पायलट क्यों नहीं निकल पाए
इस बीच, वायुसेना के सूत्रों ने कहा कि बाड़मेर में मिग हादसे के दौरान दोनों पायलट निकल क्यों सके, इसका पता कोर्ट आफ इंक्वायरी में ही चल पाएगा। दरअसल, प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि विमान ने हवा में ही आग पकड़ ली थी। पायलटों ने संभवत: विमान को आबादी से दूर ले जाने की कोशिश की, जिसके चलते वह निकल नहीं सके।

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