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एनजीटी के निर्देश पर लगाया गया प्लांट बना शोपीस, जमीन में ही सूख रहा गंदा पानी, 3 साल से बंद एसटीपी, स्टेशन का गंदा पानी प्लांट तक नहीं

गंजबासौदा (ओमप्रकाश चौरसिया)। पर्यावरण संरक्षण और पानी की कमी से निपटने के लिए रेलवे ने गंजबासौदा स्टेशन पर लाखों रुपए खर्च कर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाया था। तीन साल बाद भी प्लांट शुरू नहीं हो सका। वजह यह है कि प्लांट तक गंदा पानी पहुंचाने के लिए न पाइपलाइन बिछाई गई। नालियों की व्यवस्थित चैनेलाइजेशन भी नहीं की गई।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देश पर रेलवे ने यह प्लांट लगाया था। उद्देश्य था कि स्टेशन और रेलवे कॉलोनी से निकलने वाले गंदे पानी को फिल्टर किया जाए। पानी का दोबारा उपयोग हो। रेलवे परिसर में पानी की कमी दूर हो। पर्यावरण संरक्षण में मदद मिले। प्लांट लगने के बाद जरूरी व्यवस्था नहीं हुई। गंदा पानी प्लांट तक पहुंच ही नहीं कहा। स्टेशन और कॉलोनी से निकलने वाला पानी जमीन में समा जाता है। प्लांट सूखा पड़ा है। विडंबना यह है कि रेलवे ने प्लांट के संचालन और रखरखाव के लिए ठेका दे दिया है। कागजों पर प्लांट चलाने की व्यवस्था है। हकीकत में प्लांट तक पानी नहीं पहुंच रहा। रेलवे स्टेशन प्रबंधक एसके पाल ने बताया कि रेलवे ने एसटीपी प्लांट के संचालन का ठेका दिया है। फिलहाल प्लांट तक पानी पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं है।

रोज 55 ट्रेनों का ठहराव

स्टेशन पर 24 घंटे में 52 से 55 यात्री ट्रेनों का ठहराव होता है। प्रतिदिन लगभग 8 हजार यात्री यहां से यात्रा करते हैं। सामान्य और आरक्षित टिकट काउंटरों से रोज करीब साढ़े तीन लाख रुपए की टिकट बुकिंग होती है। लगभग 20 प्रतिशत यात्री ऑनलाइन टिकट बुक करते हैं। यह राशि सीधे विभाग के खाते में जाती है।

250 कर्मचारी पदस्थ, कॉलोनी में रहते सिर्फ 100

रेलवे स्टेशन पर करीब 250 कर्मचारी पदस्थ हैं। रेलवे कॉलोनी में करीब 100 कर्मचारी ही रहते हैं। बाकी कर्मचारी शहर की सिविल बस्तियों में रहते हैं। वजह कॉलोनी में पर्याप्त आवास नहीं होना बताया जाता है। पानी सहित बुनियादी सुविधाओं की कमी भी कारण है। स्टेशन परिसर में लगे आधे से ज्यादा स्टैंड पोस्ट अक्सर सूखे पड़े रहते हैं।

नल कूपों पर टिकी है पूरी व्यवस्था

स्टेशन और कर्मचारियों के आवासों में पानी की आपूर्ति नलकूपों से हो रही है। रेलवे परिसर में तीन नलकूप हैं। एक आरपीएफ चौकी के पास है। दूसरा प्लेटफॉर्म नंबर चार के पास है। तीसरा सिग्नल कर्मचारी क्वार्टर के पास है। तीनों नलकूपों की सप्लाई लाइनें आपस में जुड़ी हैं। पानी की सप्लाई टाइमर से नियंत्रित होती है। जरूरत के अनुसार दिन-रात अलग-अलग समय पर सप्लाई दी जाती है। इससे स्टेशन की पानी की टंकियां भरी रहती हैं।

गर्मी में फिर बढ़ जाती है परेशानी

गर्मी के मौसम में स्टेशन पर वाटर कूलर ही मुख्य सहारा होते हैं। प्लेटफॉर्म और ट्रेनों में यात्रियों को ठंडा पेयजल देने की व्यवस्था पिछले लगभग 40 वर्षों से नागरिक सेवा समिति कर रही है। चैत्र नवरात्र से समिति के सदस्य ट्रेनों के डिब्बों तक यात्रियों को ठंडा पानी पहुंचाते हैं। कोविड महामारी से पहले तक गर्मियों में कर्मचारियों के लिए रेलवे को कई बार टैंकर मंगवाने पड़ते थे।