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संघ को लेकर नैरेटिव की राजनीति और तथ्य की कसौटी -प्रकाश त्रिवेदी

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देशप्रकाश त्रिवेदीहोम

संघ को लेकर नैरेटिव की राजनीति और तथ्य की कसौटी -प्रकाश त्रिवेदी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। लोकतंत्र में किसी संगठन, विचार या विचारधारा की आलोचना अस्वाभाविक नहीं है। आलोचना लोकतांत्रिक विमर्श को मजबूत करती है, लेकिन जब इतिहास के चुनिंदा तथ्यों को संदर्भ से काटकर किसी संस्था की पूरी वैचारिक यात्रा पर प्रश्नचिह्न लगाने का प्रयास किया जाए, तब तथ्य और नैरेटिव के बीच अंतर करना आवश्यक हो जाता है।

आज संघ को लेकर विशेष रूप से तीन प्रश्न उछाले जा रहे हैं—उसका औपचारिक पंजीकरण क्यों नहीं है, माधव सदाशिव गोलवलकर यानी गुरुजी की बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में भूमिका क्या थी और सर सैयद अहमद खान से जुड़ी एक घटना को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत के कथन की ऐतिहासिक प्रामाणिकता क्या है। इन प्रश्नों पर भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय तथ्यपरक और संतुलित दृष्टि अपेक्षित है।

पंजीकरण संस्था का होता है, विचार का नहीं

RSS की स्थापना 1925 में हुई। उस समय उसकी संरचना आज की तरह किसी कंपनी, सोसायटी या पंजीकृत गैर-सरकारी संस्था के रूप में नहीं थी। यह मूलतः स्वयंसेवकों के माध्यम से सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन निर्माण का प्रयास था। वर्तमान में भी RSS स्वयं को पंजीकृत सोसायटी के बजाय संविधान के अंतर्गत मान्य ‘body of individuals’ के रूप में प्रस्तुत करता है।

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी और वैचारिक अंतर समझना चाहिए। भारत में किसी संगठन का पंजीकरण उसके अस्तित्व का एकमात्र प्रमाण नहीं है। Societies Registration Act, 1860 ने साहित्यिक, वैज्ञानिक और charitable societies के पंजीकरण की व्यवस्था की थी; लेकिन प्रत्येक सामाजिक, सांस्कृतिक या वैचारिक समूह का अस्तित्व केवल पंजीकरण पर निर्भर नहीं होता।

इसलिए रामकृष्ण मिशन का उदाहरण देना अपने आप में RSS की वैधता पर प्रश्न खड़ा नहीं करता। रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 में हुई और उसका औपचारिक पंजीकरण 1909 में हुआ। स्वयं रामकृष्ण मिशन की आधिकारिक सामग्री भी यही बताती है।

दो संस्थाओं के संगठनात्मक स्वरूप अलग हो सकते हैं। किसी संस्था ने पंजीकरण कराया, इसलिए दूसरी संस्था भी उसी प्रारूप में हो—यह कोई सार्वभौमिक कानूनी सिद्धांत नहीं है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि संघ से जुड़े विभिन्न सेवा, शैक्षणिक, सामाजिक और परोपकारी उपक्रमों के लिए अलग-अलग संस्थाएं और ट्रस्ट बनाए गए हैं। अतः RSS के स्वयं पंजीकृत न होने और संघ-प्रेरित विभिन्न संस्थाओं के विधिक रूप से पंजीकृत होने को विरोधाभास की तरह प्रस्तुत करना भी उचित नहीं है।

गुरुजी और BHU का प्रश्न

माधव सदाशिव गोलवलकर की बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में भूमिका को लेकर ‘प्रोफेसर’ और ‘डेमोस्ट्रेटर’ शब्दों के बीच विवाद खड़ा किया जा रहा है। यहां भी शब्दों के बजाय उस समय की विश्वविद्यालयी व्यवस्था और उनके वास्तविक कार्य को समझना चाहिए।

उपलब्ध जीवनी संबंधी स्रोत उन्हें BHU में Zoology पढ़ाने वाले शिक्षक के रूप में दर्ज करते हैं; संघ से संबंधित जीवनी सामग्री उन्हें पूर्व BHU lecturer भी बताती है।

यदि किसी ऐतिहासिक पदनाम के बारे में अलग-अलग स्रोतों में भिन्नता है तो उसका समाधान दस्तावेजों से होना चाहिए, न कि इस आधार पर कि एक पदनाम स्वीकार करने से किसी वैचारिक पक्ष को लाभ और दूसरे को नुकसान होगा।

किसी व्यक्ति की भूमिका को केवल पदनाम के विवाद तक सीमित कर देना भी इतिहास की गंभीरता के साथ न्याय नहीं करता। गुरुजी का बौद्धिक और संगठनात्मक योगदान उनके बाद के सार्वजनिक जीवन तथा संघ के विस्तार के संदर्भ में अधिक व्यापक रूप से देखा जाना चाहिए।

सर सैयद अहमद खान का प्रसंग

मोहन भागवत द्वारा सर सैयद अहमद खान से संबंधित कही गई घटना को लेकर भी समर्थन और खंडन सामने आ रहे हैं। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होना चाहिए कि मूल स्रोत क्या है।

ऐतिहासिक प्रसंगों को उद्धृत करते समय भाषण, संस्मरण, पत्र, समकालीन दस्तावेज, जीवनी और बाद की मौखिक परंपरा—इन सभी स्रोतों की प्रकृति अलग होती है। इसलिए किसी घटना के प्रमाण की जांच करते समय यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वह प्राथमिक स्रोत पर आधारित है या द्वितीयक/मौखिक परंपरा पर।

यदि किसी कथन का प्रमाण कमजोर है तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। लेकिन यदि किसी घटना की व्याख्या पर मतभेद है तो उसे तत्काल ‘झूठ’ या ‘प्रचार’ घोषित कर देना भी इतिहास की वैज्ञानिक पद्धति नहीं है।

संघ पर प्रश्न हों, लेकिन प्रश्न निष्पक्ष हों

RSS से असहमति रखने वालों को प्रश्न पूछने का पूरा अधिकार है। संघ की विचारधारा, उसके सामाजिक प्रभाव, राजनीतिक संबंधों, अल्पसंख्यकों को लेकर दृष्टिकोण, इतिहास-बोध या उसके विभिन्न संगठनों की भूमिका पर भी गंभीर बहस हो सकती है।

लेकिन किसी संगठन की आलोचना और उसके विरुद्ध नैरेटिव निर्माण में अंतर होता है।

यदि पंजीकरण का प्रश्न है तो कानून के आधार पर चर्चा हो। यदि वित्तीय पारदर्शिता का प्रश्न है तो उपलब्ध वित्तीय दस्तावेजों और संबंधित संस्थाओं की वैधानिक स्थिति की जांच हो। यदि इतिहास का प्रश्न है तो प्राथमिक स्रोत सामने रखे जाएं। यदि किसी व्यक्ति की शैक्षणिक भूमिका पर सवाल है तो विश्वविद्यालय के अभिलेखों से उत्तर खोजा जाए।

यही स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श की पहचान होगी।

विचार की शक्ति को केवल कागज से नहीं मापा जा सकता

किसी विचार की सामाजिक शक्ति उसके पंजीकरण प्रमाणपत्र से नहीं, बल्कि समाज में उसके प्रभाव, स्वीकार्यता और उसके कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता से भी मापी जाती है। भारत में अनेक विचार, परंपराएं और सामाजिक आंदोलन औपचारिक संस्थागत ढांचे से बहुत पहले अस्तित्व में आए और बाद में उनके लिए अलग-अलग संस्थाएं बनीं।

संघ का मूल दावा भी यही है कि वह एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में स्वयंसेवकों के माध्यम से समाज निर्माण करता है। इस दावे से सहमत होना या असहमत होना अलग विषय है, लेकिन उसके अस्तित्व को केवल registration certificate की अनुपस्थिति से समझना अधूरा विश्लेषण होगा। हाल के सार्वजनिक विमर्श में भी संघ की गैर-पंजीकृत स्थिति को लेकर यही तर्क सामने आया है।

भारतीय ज्ञान परंपरा, सेवा, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में संघ और उससे जुड़े अनेक संगठनों के कार्यों का मूल्यांकन भी इसी खुले दृष्टिकोण से होना चाहिए। जहां उपलब्धियां हैं, वहां उनका उल्लेख हो; जहां कमियां हैं, वहां आलोचना हो।

वैचारिक संघर्ष को वैमनस्य में बदलना उचित नहीं

भारत की लोकतांत्रिक शक्ति इस बात में है कि यहां परस्पर विरोधी विचार भी साथ-साथ मौजूद रह सकते हैं। संघ की विचारधारा से सहमति रखने वाले और असहमति रखने वाले दोनों भारत के लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा हैं।

इसलिए संघ की आलोचना करने वालों को ‘राष्ट्रविरोधी’ और संघ के समर्थकों को ‘कट्टर’ घोषित कर देना—दोनों ही अतिवाद हैं। विमर्श को व्यक्ति और संगठन की नीयत पर आरोप लगाने के बजाय विचार, तथ्य और प्रमाण पर केंद्रित किया जाना चाहिए।

आज आवश्यकता संघ का महिमामंडन करने की भी नहीं है और उसे खारिज करने के लिए चयनित तथ्यों का उपयोग करने की भी नहीं। आवश्यकता है कि RSS को भी उसी लोकतांत्रिक कसौटी पर परखा जाए जिस पर देश की प्रत्येक संस्था और विचारधारा को परखा जाना चाहिए।

प्रश्न पूछिए, लेकिन प्रमाण के साथ। आलोचना कीजिए, लेकिन संदर्भ के साथ। असहमति रखिए, लेकिन इतिहास को अपने पक्ष का हथियार मत बनाइए।

भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब विचारों की लड़ाई तथ्यों के मैदान में लड़ी जाएगी, नैरेटिव के शोर में नहीं।

और यही किसी भी वैचारिक संगठन के प्रति सबसे सकारात्मक, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण होगा।