मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा : सवाल यात्रा पर है या हिंदुत्व की अवधारणा पर ?
-प्रकाश त्रिवेदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के...
-प्रकाश त्रिवेदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के...
उज्जैन। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने...
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रक्षाबंधन...

-प्रकाश त्रिवेदी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा को लेकर उठाए जा रहे सवालों ने एक बार फिर भारतीय सार्वजनिक विमर्श के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या हम किसी व्यक्ति और संगठन के विचारों से असहमति रखते हुए भी उसके संवाद के अधिकार को स्वीकार कर सकते हैं? या फिर वैचारिक असहमति इतनी गहरी हो चुकी है कि संवाद की हर संभावना भी संदेह के घेरे में आने लगी है?
किसी सार्वजनिक व्यक्ति की विदेश यात्रा पर प्रश्न उठाना लोकतंत्र में अस्वाभाविक नहीं है। प्रश्न उठने चाहिए, आलोचना भी होनी चाहिए और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय किसी संगठन की विचारधारा की समीक्षा भी होनी चाहिए। लेकिन प्रश्न यह है कि आलोचना तथ्यों के आधार पर है या पहले से निर्मित नैरेटिव के आधार पर?
डॉ. भागवत की अमेरिका यात्रा को लेकर यदि वास्तविक गतिविधियों, संवाद और उद्देश्यों पर सवाल हैं तो उनका उत्तर तथ्य देंगे। लेकिन यदि किसी यात्रा को केवल इस आधार पर संदिग्ध बना दिया जाए कि उसका संबंध हिंदुत्व की विचारधारा से है, तो फिर बहस यात्रा से आगे बढ़कर हिंदुत्व की अवधारणा पर पहुंच जाती है।
यहीं से भारतीय चिंतन की एक महत्वपूर्ण परीक्षा शुरू होती है।

हिंदुत्व क्या है?
क्या हिंदुत्व का अर्थ केवल धार्मिक वर्चस्व है? क्या हिंदुत्व का अर्थ दूसरे मतों, पंथों और विश्वासों का निषेध है? क्या हिंदुत्व की प्रतिष्ठा का अर्थ किसी अन्य धार्मिक पहचान को कमजोर करना है?
यदि उत्तर हां है तो भारतीय सभ्यता के हजारों वर्षों के अनुभव को हम किस तरह समझेंगे?
भारत में वैचारिक असहमति कोई आधुनिक राजनीतिक आविष्कार नहीं है। यहां आस्तिक और नास्तिक परंपराओं ने साथ-साथ विचार किया। दर्शन की अनेक धाराओं ने एक-दूसरे से प्रश्न किए। उपासना की विभिन्न पद्धतियां विकसित हुईं। बहस हुई, शास्त्रार्थ हुए और मतभेद भी हुए। फिर भी भारतीय सभ्यता ने विविधता को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानकर समाप्त करने का प्रयास नहीं किया।
यही भारतीयता की विशिष्ट शक्ति है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ केवल एक सुंदर वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य को व्यापक परिवार के रूप में देखने वाली दृष्टि है। इसी तरह समानता और परस्पर सम्मान की भावना भारतीय चिंतन में अनेक स्तरों पर दिखाई देती है। इसलिए हिंदुत्व को स्वाभाविक रूप से घृणा, संघर्ष और असहिष्णुता का पर्याय बना देना एक गंभीर बौद्धिक सरलीकरण होगा।
लेकिन यहां एक और प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या हिंदुत्व की आलोचना करना गलत है?
नहीं।
लोकतंत्र में किसी भी विचारधारा की आलोचना की जा सकती है। संघ की आलोचना भी हो सकती है और डॉ. भागवत के विचारों से असहमति भी व्यक्त की जा सकती है। लेकिन आलोचना और पूर्वाग्रह में अंतर होना चाहिए। तथ्य और धारणा में अंतर होना चाहिए। प्रश्न और आरोप में अंतर होना चाहिए।
यदि किसी विचारधारा से असहमति है तो उसके मूल ग्रंथों, वक्तव्यों, कार्यों और नीतियों के आधार पर बहस कीजिए। लेकिन किसी व्यक्ति की विदेश यात्रा को लेकर ऐसी बातें प्रचारित करना, जिनका तथ्यात्मक आधार ही संदिग्ध हो, लोकतांत्रिक विमर्श को समृद्ध नहीं करता।
आज असली संकट शायद विचारों का नहीं, नैरेटिव का है।
सोशल मीडिया और राजनीतिक विमर्श के इस दौर में किसी व्यक्ति के बारे में एक धारणा पहले बनाई जाती है और फिर उसी धारणा के अनुरूप तथ्यों को चुना जाता है। जो तथ्य अनुकूल हों उन्हें सामने रखा जाता है और जो प्रतिकूल हों उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि समाज तथ्य पर नहीं, नैरेटिव पर प्रतिक्रिया करने लगता है।
क्या यह स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है?
डॉ. मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा का मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर होना चाहिए। यदि उनके संवाद में विश्वबंधुत्व, सांस्कृतिक संवाद, भारतीय दर्शन, सामाजिक समरसता और परस्पर सम्मान की बातें हैं तो उन्हें सुना जाना चाहिए। यदि कोई विचार विवादास्पद है तो उसकी आलोचना होनी चाहिए। लेकिन किसी संवाद की शुरुआत ही इस धारणा से कर देना कि उसका उद्देश्य विभाजन या वर्चस्व स्थापित करना है, स्वयं एक पूर्वाग्रह हो सकता है।
भारत आज विश्व के साथ संवाद के एक नए दौर में है। ऐसे समय में भारतीय सांस्कृतिक विचारों को दुनिया के सामने रखना अपने आप में कोई असामान्य घटना नहीं है। असली प्रश्न यह होना चाहिए कि भारत दुनिया से क्या कह रहा है और दुनिया भारत को किस रूप में सुन रही है।
संवाद से डर किसे लगता है?
जिस विचार को अपने तर्क पर विश्वास है, वह संवाद से भागता नहीं। वह प्रश्नों का सामना करता है। वह आलोचना सुनता है और अपने विचारों को भी कसौटी पर कसता है।
इसलिए डॉ. मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा पर बहस होनी चाहिए—लेकिन यात्रा के वास्तविक तथ्यों पर। हिंदुत्व पर बहस होनी चाहिए—लेकिन उसके दार्शनिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भों के साथ। संघ की आलोचना होनी चाहिए—लेकिन प्रमाण और तर्क के साथ।
असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु असत्य लोकतंत्र की शक्ति नहीं हो सकता।
भारत की बौद्धिक परंपरा हमें यह सिखाती है कि सत्य तक पहुंचने के लिए प्रश्न आवश्यक हैं। इसलिए प्रश्न पूछिए, तीखे प्रश्न पूछिए, असहमति व्यक्त कीजिए—लेकिन सत्य को प्रश्नों का पहला आधार बनाइए।
क्योंकि अंततः लड़ाई मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा और उसके विरोध के बीच नहीं है।
असली संघर्ष तथ्य और नैरेटिव के बीच है।
और लोकतंत्र में जीत हमेशा तथ्य की होनी चाहिए।