"पर्यूषण पूर्व एक आलेख" श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण : आठ दिनों की आत्मसाधना - Samacharline.com
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“पर्यूषण पूर्व एक आलेख” श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण : आठ दिनों की आत्मसाधना

अक्षय जैन। श्वेतांबर जैन परंपरा में पर्युषण महापर्व आत्मशुद्धि, संयम, स्वाध्याय, तप, त्याग और क्षमाभाव की साधना का महान पर्व है। आठ दिनों की यह आध्यात्मिक यात्रा हमें बाहरी संसार से भीतर की ओर ले जाती है। पर्युषण का पूर्व शुभारंभ वस्तुतः अपने मन, वचन और कर्म को धर्ममय बनाने के संकल्प का अवसर है।

पहला दिन — आराधना और संकल्प:
पर्युषण का आरंभ आत्मचिंतन और दृढ़ संकल्प से होता है। श्रावक-श्राविका सामायिक, स्वाध्याय और धार्मिक आराधना के माध्यम से आने वाले दिनों के लिए संयम का संकल्प लेते हैं।

दूसरा दिन — स्वाध्याय:
आगमों, धार्मिक ग्रंथों और साधु-साध्वी भगवंतों के प्रवचनों के माध्यम से जैन दर्शन, अहिंसा और आत्मकल्याण के सिद्धांतों को समझने का प्रयास किया जाता है।

तीसरा दिन — संयम और त्याग:
भोजन, वाणी, व्यवहार और इच्छाओं पर संयम रखते हुए तप एवं त्याग की भावना को जीवन में उतारने का प्रयास होता है।

चौथा दिन — प्रतिक्रमण और आत्मावलोकन:
अपने द्वारा किए गए प्रमाद, भूल और अनुचित व्यवहार का चिंतन कर आत्मसुधार की दिशा में कदम बढ़ाया जाता है। प्रतिक्रमण इसी आत्मनिरीक्षण की महत्वपूर्ण साधना है।

पाँचवाँ दिन — तप और साधना:
उपवास, आयंबिल, एकासना, ब्यासना जैसे तप के माध्यम से शरीर के साथ मन को भी अनुशासित करने का प्रयास किया जाता है।

छठा दिन — मैत्री और करुणा:
राग-द्वेष को कम कर प्रत्येक जीव के प्रति मैत्री, करुणा और अहिंसा की भावना विकसित करना पर्युषण की मूल प्रेरणा है।

सातवाँ दिन — क्षमा की तैयारी:
मन में संचित कटुता, शिकायत और अहंकार को त्यागकर सभी जीवों के प्रति क्षमाभाव विकसित करने की साधना की जाती है।

आठवाँ दिन — संवत्सरी और क्षमायाचना:
श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण का सर्वोच्च आध्यात्मिक पड़ाव संवत्सरी है। प्रतिक्रमण, आत्मावलोकन और अंततः “मिच्छामि दुक्कडम्” के माध्यम से हम मन, वचन और काया से हुई भूलों के लिए क्षमा मांगते हैं और दूसरों को हृदय से क्षमा करते हैं।

पर्युषण का सार यही है कि आठ दिन की आराधना केवल आठ दिनों तक सीमित न रहे। आगम का ज्ञान आचरण बने, तप से संयम आए, प्रतिक्रमण से आत्मसुधार हो और संवत्सरी की क्षमा पूरे वर्ष के व्यवहार में दिखाई दे।

यही श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण की वास्तविक साधना है आत्मा की ओर लौटना, कर्मों का क्षय करना और जीवन को अहिंसा, संयम एवं क्षमा से प्रकाशित करना।