पर्यूषण पर्व में धर्म का मर्म कहाँ है..? जब धर्मसभा की पहचान साधना नहीं, भीड़ और वीवीआईपी से होने लगे
अक्षय जैन। पर्यूषण आत्मशुद्धि, संयम और...
अक्षय जैन। पर्यूषण आत्मशुद्धि, संयम और...
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव “मुख्यमंत्री स्कूटी...
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा...

अक्षय जैन। पर्यूषण आत्मशुद्धि, संयम और अहंकार के विसर्जन का पर्व है। लेकिन बदलते दौर में सवाल उठ रहा है कि क्या हम इसके मूल मर्म से दूर होते जा रहे हैं? धर्मसभा के बाद चर्चा अब इस बात की अधिक होती है कि कितनी भीड़ जुटी, कौन उद्योगपति आया, कौन राजनीतिक हस्ती पहुंची और मंच पर कौन-कौन से वीवीआईपी नजर आए। स्वागत, मालाएं, तस्वीरें और प्रचार इन सबके बीच साधना और आत्मचिंतन कहीं पीछे छूटते दिखाई देते हैं।
धर्मसभा की सफलता का पैमाना यदि श्रद्धा के बजाय प्रभावशाली चेहरों की संख्या बन जाए तो यह आत्ममंथन का विषय है। किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति का धर्मसभा में आना निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन उसकी उपस्थिति को धर्म की उपलब्धि मान लेना धर्म को सामाजिक हैसियत के तराजू पर तौलना है।
श्रीसंघ अध्यक्ष और ट्रस्टी समाज के सेवक हैं। धार्मिक मंच उनकी सामाजिक स्वीकार्यता की मुहर लगाने का माध्यम नहीं होना चाहिए। धर्म का मंच जितना ऊंचा हो, वहां व्यक्ति का ‘मैं’ उतना ही छोटा होना चाहिए।
पर्यूषण में असली सवाल यह नहीं कि मंच पर कौन आया, बल्कि यह है कि हमारे भीतर क्या बदला? क्रोध कम हुआ या नहीं, अहंकार झुका या नहीं, लोभ पर नियंत्रण आया या नहीं और क्षमा केवल शब्द रही या व्यवहार बनी?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर हमारे पास नहीं हैं तो बड़ी भीड़, भव्य आयोजन और वीवीआईपी उपस्थिति धर्म की सफलता का प्रमाण नहीं हो सकते।
धर्म की प्रतिष्ठा अखबारों की तस्वीरों से नहीं, व्यक्ति के आचरण से होती है। इसलिए पर्यूषण में एक असहज सवाल जरूरी है हम धर्मसभा में धर्म खोज रहे हैं या अपनी सामाजिक हैसियत का प्रदर्शन? कहीं ऐसा तो नहीं कि आत्मशुद्धि के पर्व पर हम अनजाने में अहंकार का उत्सव मनाने लगे हैं?