लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण और वर्तमान परिदृश्य: अनुत्तरित सवाल और हमारी जिम्मेदारी
वर्तमान परिदृश्य में सवाल कई हैं,...
वर्तमान परिदृश्य में सवाल कई हैं,...
मुख्य सचिवों के राष्ट्रीय सम्मेलन में...

वर्तमान परिदृश्य में सवाल कई हैं, जिनका जवाब हमें स्वयं में ही तलाशना होगा।
हमारे समाज का स्वरूप एक पिरामिड की तरह है, जहाँ शीर्ष संस्थाओं के कार्य और व्यवहार का सीधा प्रभाव धरातल (आम जनता) पर पड़ता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के शिल्पकारों ने इस व्यवस्था को चार स्तंभों पर खड़ा किया था—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस। इन सभी संस्थाओं में एक-दूसरे के परस्पर पूरक और अनुशासक होने की दोनों भूमिकाएँ सन्निहित की गई थीं।
परंतु, वर्तमान में कहीं न कहीं सभी संस्थाएँ अपने मूल उद्देश्य—जन कल्याण और लोक कल्याण की भावना—से दूर जाती दिख रही हैं। आज के वातावरण में कई ऐसे सवाल खड़े हैं, जिनका जिम्मेदार जवाब लोग तलाश रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में घटित दो घटनाएँ—एक प्रयागराज की और दूसरी लखनऊ की—इसकी गवाह हैं। इन दोनों ही घटनाओं में लोग योगी सरकार की उस छवि को तलाश रहे हैं, जिसमें किसी भी आपराधिक घटना में अपराधी को उसके दुस्साहस के लिए अंजाम तक पहुँचाने की सख्त नीति रही है। इसके विपरीत, वर्तमान व्यवस्था की कार्यशैली ने तमाम सवाल खड़े कर दिए हैं, जहाँ अपराधी अपने दुस्साहस के लिए अंजाम तक पहुँचने के बजाय नए षड्यंत्र रच रहे हैं। कई पत्रकार बंधुओं ने भी अपने-अपने तरीके से इन घटनाक्रमों पर प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं, लेकिन बुनियादी सवाल अब भी वातावरण में तैर रहे हैं।
देश-दुनिया में योगी सरकार की जो छवि बनी है, उसमें उनकी सख्त कानून-व्यवस्था की अहम भूमिका है। लेकिन प्रयागराज के अधिवक्ता सतीश चंद्र श्रीवास्तव और लखनऊ के शिवा शर्मा के मामले में हुई प्रशासनिक कार्रवाई बहुत लचर दिखाई दी, जिसने अनेकों सवाल खड़े कर दिए हैं।
लेकिन प्रश्न केवल इतना नहीं है। असली सवाल वर्तमान में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस—इन सभी को लेकर है। इन सभी मानक संस्थाओं में आखिर हम लोग ही तो हैं; तो क्या हमारा कार्य-व्यवहार लोकतांत्रिक प्रणाली के शिल्पकारों की मंशा के अनुरूप है? क्या लोकतांत्रिक प्रणाली द्वारा सभी नागरिकों को दिए गए समान अवसर, समान न्याय और निष्पक्ष अभिव्यक्ति के अधिकार हमारी कार्यशैली में दृष्टिगोचर होते हैं?
लोकतांत्रिक व्यवस्था ने हमें इस बात की गारंटी दी थी कि जाति-पाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा।
उसने हमें यह आजादी कभी नहीं दी कि जाति ही किसी व्यक्ति की योग्यता और क्षमता का सारा पैमाना बन जाए। दुर्भाग्य से, आज सभी राजनीतिक दलों ने जाति-पाति की व्यवस्था को राजनैतिक सफलता हासिल करने वाला एक यंत्र बना लिया है। इसके कारण जनप्रतिनिधि के चयन का आधार उसकी सामाजिक सेवा, सक्रियता और शुचिता के बजाय जाति बन गई है; और जाति में भी धनबल व बाहुबल जैसे मानकों को अपना लिया गया है।
धीरे-धीरे समूचा राजनैतिक वातावरण एक बाजार में बदल गया है, जहाँ न कोई नैतिक मूल्य बचे हैं, न वैचारिक प्रतिबद्धता और न ही शुचिता। इसका सीधा प्रभाव सदन चलते समय जन प्रतिनिधियों की विधायी रुचि, ज्ञान और सहभागिता में स्पष्ट रूप से दिखता है। विधायिका में चुने गए प्रतिनिधियों की इस कार्यशैली का कुप्रभाव गवर्नेंस पर भी पड़ रहा है। कार्यपालिका का कार्य अब मेरिट (योग्यता) के आधार पर नहीं, बल्कि जाति-पाति के प्रभाव से आच्छादित हो गया है।
यही नहीं, न्यायपालिका की कार्यशैली पर भी कई गंभीर सवाल वातावरण में व्याप्त हैं। न्यायपालिका द्वारा न्याय मिलने में अत्यधिक देरी और कई बार निर्णयों की निष्पक्षता को लेकर भी गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। वहीं मीडिया में अभिव्यक्ति को लेकर भी कई गंभीर सवाल हैं। स्वतंत्र अभिव्यक्ति और निष्पक्षता के लिए जाने जाने वाले कलमकार भी अब धीरे-धीरे जाति-पाति के प्रभाव से प्रभावित होने लगे हैं।
वस्तुतः यह वैचारिक और नैतिक क्षरण हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को असहज और असंतुलित बना रहा है। समय रहते समाज के सभी जिम्मेदार लोगों को राष्ट्रहित, लोकहित और जनहित में इस पर गंभीर चिंतन करना होगा। अन्यथा, जो सवाल आज खड़े हैं वे जवाब तो मांगेंगे ही, और उनके अनुत्तरित रहने के दोषी भविष्य में हम ही माने जाएंगे।