संघ के संगठनात्मक बदलाव : शताब्दी के अनुभव से भविष्य की नई संरचना की ओर
-प्रकाश त्रिवेदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)...
-प्रकाश त्रिवेदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)...
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने...
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मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा है...
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-प्रकाश त्रिवेदी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के लिए राष्ट्र, समाज और संस्कृति की चिंता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण अपने संगठन को समय और परिस्थितियों के अनुरूप सक्षम बनाए रखना भी है। पिछले सौ वर्षों में संघ ने जिस संगठनात्मक ढाँचे के आधार पर अपनी यात्रा पूरी की, अब उसमें व्यापक बदलाव की तैयारी दिखाई दे रही है। यह महज पदों, दायित्वों अथवा प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन का मामला नहीं है, बल्कि संगठन की कार्यशैली, निर्णय प्रक्रिया और भविष्य की चुनौतियों से निपटने की क्षमता को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास है।
संघ की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर संगठनात्मक व्यवस्था की समीक्षा का महत्व और बढ़ जाता है। एक शताब्दी तक निरंतर विस्तार करने वाले संगठन के सामने अब चुनौती केवल अपने विचारों और कार्यों का विस्तार करने की नहीं, बल्कि उस विस्तार को व्यवस्थित, अनुशासित और परिणामोन्मुख बनाए रखने की भी है। यही कारण है कि संघ अपने सांगठनिक तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।
संघ की केंद्रीय कार्यकारी मंडल, अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा तथा क्षेत्र, प्रांत और विभाग जैसी संगठनात्मक इकाइयों की संरचना और कार्यप्रणाली में बदलाव की चर्चा इसी व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है। सवाल स्वाभाविक है कि आखिर एक सौ वर्षों से चली आ रही व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? क्या वर्तमान व्यवस्था अप्रासंगिक हो गई है अथवा संगठन के बढ़ते विस्तार ने नई प्रशासनिक और सांगठनिक जरूरतें पैदा कर दी हैं?
वास्तविकता यह है कि कोई भी संगठन अपनी स्थापना के समय निर्धारित परिस्थितियों के आधार पर अनंतकाल तक नहीं चल सकता। समय के साथ सामाजिक संरचना बदलती है, कार्यक्षेत्र का विस्तार होता है, चुनौतियों का स्वरूप बदलता है और संगठन के भीतर दायित्वों की प्रकृति भी जटिल होती जाती है। संघ भी इससे अलग नहीं है। 1925 में स्थापित संगठन आज देश के लगभग सभी हिस्सों में अपनी उपस्थिति और गतिविधियों का विस्तार कर चुका है। सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सेवा गतिविधियों में संघ से जुड़े अनेक संगठन सक्रिय हैं। ऐसे व्यापक तंत्र के संचालन के लिए केवल परंपरागत संगठनात्मक व्यवस्था पर्याप्त नहीं हो सकती।
संघ के संगठनात्मक बदलावों का एक महत्वपूर्ण पक्ष प्रांत और क्षेत्र की भौगोलिक संरचना की समीक्षा है। समय के साथ अनुभवों के आधार पर यह महसूस किया गया कि प्रशासनिक और सांगठनिक इकाइयों का निर्धारण केवल ऐतिहासिक परंपराओं के आधार पर नहीं, बल्कि कार्यक्षेत्र की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार होना चाहिए। किसी क्षेत्र का भौगोलिक विस्तार, जनसंख्या, सामाजिक परिस्थितियां, स्वयंसेवकों की उपलब्धता और संगठनात्मक गतिविधियों का स्वरूप इन इकाइयों की कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं। ऐसे में प्रांत और क्षेत्र की सीमाओं का पुनर्निर्धारण संगठन को अधिक सुगम और प्रभावी बनाने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा सकता है।
इसका उद्देश्य केवल इकाइयों की संख्या बढ़ाना या घटाना नहीं, बल्कि दायित्वों का संतुलित वितरण करना और निर्णय प्रक्रिया को जमीनी स्तर तक अधिक प्रभावी बनाना होना चाहिए। जब संगठन की इकाइयां अपने कार्यक्षेत्र के अनुरूप होती हैं तो नेतृत्व की पहुंच बढ़ती है, स्थानीय समस्याओं की समझ बेहतर होती है और निर्णयों का क्रियान्वयन भी अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।
दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठकों की समयबद्धता और कार्यप्रणाली से जुड़ा है। प्रतिनिधि सभा संघ की महत्वपूर्ण नीतिगत और संगठनात्मक चर्चाओं का मंच है। इसकी बैठकों को अधिक व्यवस्थित, नियमित और समयबद्ध बनाने का प्रयास इस बात का संकेत है कि संघ अपनी निर्णय प्रक्रिया को अधिक संस्थागत स्वरूप देना चाहता है। किसी बड़े संगठन में विचार-विमर्श और निर्णयों के बीच निरंतरता बनाए रखना आवश्यक होता है। नियमित समीक्षा से न केवल संगठन की प्रगति का आकलन संभव होता है, बल्कि निर्धारित लक्ष्यों और वास्तविक उपलब्धियों के बीच अंतर को भी समझा जा सकता है।
संघ की नीतिनिर्धारक व्यवस्था में विभिन्न स्तरों पर बैठकों और विचार-विमर्श के बाद प्रशासनिक तथा सांगठनिक बदलावों को निचले स्तर तक प्रभावी बनाने पर जोर दिया जाना भी महत्वपूर्ण है। किसी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके शीर्ष नेतृत्व में ही नहीं, बल्कि उसकी जमीनी इकाइयों की सक्रियता और कार्यक्षमता में होती है। यदि शीर्ष स्तर पर लिए गए निर्णय नीचे तक स्पष्ट रूप से नहीं पहुंचते अथवा उनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी तय नहीं होती तो संगठनात्मक ऊर्जा का अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आता।
यहीं कार्यविभाजन और दायित्वों के स्पष्ट निर्धारण का महत्व सामने आता है। संगठन में जिम्मेदारियां जितनी स्पष्ट होंगी, जवाबदेही भी उतनी ही सुनिश्चित होगी। एक ही काम के लिए अनेक स्तरों पर जिम्मेदारी होने या किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए किसी एक स्तर को उत्तरदायी नहीं बनाए जाने से भ्रम और अनावश्यक विलंब की स्थिति बन सकती है। इसलिए प्रत्येक इकाई, पदाधिकारी और कार्यकर्ता के दायित्वों का स्पष्ट निर्धारण संगठनात्मक दक्षता बढ़ाने के लिए जरूरी है।
हालांकि संगठनात्मक परिवर्तन का वास्तविक मूल्यांकन केवल नई संरचना घोषित होने से नहीं होगा। इसका परीक्षण इस बात से होगा कि क्या इससे निर्णय प्रक्रिया तेज होती है, क्या कार्यकर्ताओं की भागीदारी बढ़ती है, क्या स्थानीय स्तर पर नेतृत्व विकसित होता है और क्या संगठन अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को अधिक प्रभावी ढंग से निभा पाता है। किसी भी बड़े संगठन में बदलाव के साथ यह सावधानी भी आवश्यक है कि प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने की प्रक्रिया में उसकी मूल कार्यसंस्कृति, संवाद और सामूहिकता कमजोर न पड़े।
संघ की एक विशिष्ट पहचान उसकी शाखा व्यवस्था, स्वयंसेवकों का अनुशासन, व्यक्तिगत संपर्क और सामूहिक नेतृत्व की परंपरा रही है। संगठनात्मक पुनर्गठन के दौरान इन मूल विशेषताओं को बनाए रखना उतना ही आवश्यक है जितना नई व्यवस्थाओं को अपनाना। आधुनिक प्रबंधन की जरूरतों और परंपरागत संगठनात्मक मूल्यों के बीच संतुलन ही इस परिवर्तन की सफलता तय करेगा।
संघ के सामने आज केवल संगठन के विस्तार की चुनौती नहीं है। सामाजिक विकार, पारिवारिक विघटन, वैचारिक मतभेद, सांस्कृतिक असंतुलन, युवाओं की बदलती सोच और तकनीकी परिवर्तन जैसी अनेक चुनौतियां हैं। समाज के विभिन्न वर्गों के साथ संवाद स्थापित करना और नई पीढ़ी को रचनात्मक सामाजिक कार्यों से जोड़ना भी आवश्यक है। इन सभी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक ऐसा संगठनात्मक तंत्र चाहिए जो मजबूत होने के साथ-साथ लचीला, संवादशील और परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील भी हो।
दरअसल, सौ वर्ष की यात्रा के बाद संघ का संगठनात्मक पुनर्गठन इस बात की परीक्षा भी है कि कोई संस्था अपनी परंपराओं को सुरक्षित रखते हुए भविष्य की आवश्यकताओं के लिए स्वयं को कितना तैयार कर सकती है। परिवर्तन का उद्देश्य अतीत को नकारना नहीं, बल्कि अतीत के अनुभवों से सीखकर भविष्य की राह को अधिक सुगम बनाना होना चाहिए।
संघ के इस प्रयास को केवल प्रशासनिक फेरबदल के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह एक ऐसे संगठन की आत्मसमीक्षा है, जिसने एक सदी में व्यापक सामाजिक विस्तार हासिल किया है और अब अपनी अगली शताब्दी की चुनौतियों के लिए कार्यपद्धति को अधिक व्यवस्थित करना चाहता है। अंततः किसी भी संगठन की जीवंतता उसकी पुरानी व्यवस्था को जस का तस बनाए रखने में नहीं, बल्कि समय की मांग के अनुसार स्वयं को बदलने की क्षमता में होती है। संघ के प्रस्तावित सांगठनिक बदलावों की सफलता भी इसी कसौटी पर आंकी जाएगी।