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मंदिर संस्कृति के संरक्षण और पुनर्स्थापन पर वैश्विक संवाद, भारतीय मंदिर परंपरा को नई दिशा, उज्जैन में अंतरराष्ट्रीय शोधसंगोष्ठी प्रारंभ

उज्जैन। महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद एवं महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में विक्रमोत्सव 2026 के अंतर्गत “मंदिर संस्कृति–वास्तु, व्यवस्थापन, संघर्ष एवं पुनरुत्थान” विषय पर त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। उद्घाटन सत्र में देश-विदेश से आए विद्वानों, शोधार्थियों एवं शिक्षाविदों की गरिमामयी उपस्थिति रही। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरु प्रो. शिवशंकर मिश्र ने की।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा—“मंदिर केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के केंद्र रहे हैं। मंदिर संस्कृति का संरक्षण और पुनर्स्थापन हमारी सभ्यता के पुनर्जागरण का आधार है। आज आवश्यकता है कि शास्त्र, वास्तु और आधुनिक प्रबंधन के समन्वय से मंदिरों को सशक्त एवं सुव्यवस्थित बनाया जाए।”संगोष्ठी में थाईलैंड से पधारे विद्वान श्री पी. माथी ने अपने अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से मंदिर संस्कृति के वैश्विक आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा—“भारतीय मंदिर परंपरा ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया की सांस्कृतिक संरचना को भी गहराई से प्रभावित किया है।

थाईलैंड सहित अनेक देशों में मंदिर सामाजिक जीवन, शिक्षा और नैतिक मूल्यों के केंद्र हैं। आज आवश्यकता है कि भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच सांस्कृतिक एवं अकादमिक सहयोग को सुदृढ़ किया जाए, ताकि मंदिर संस्कृति का संरक्षण एक वैश्विक अभियान बन सके।” उन्होंने भारतीय मंदिर वास्तु और आध्यात्मिकता को विश्व के लिए प्रेरणास्रोत बताते हुए इस शोध संगोष्ठी को “संस्कृति के पुनरुत्थान की ऐतिहासिक पहल” कहा।

संगोष्ठी में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति

प्रो. बिहारीलाल शर्मा ने कहा कि भारतीय मंदिर केवल उपासना स्थल नहीं, बल्कि संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक संगठन के केंद्र रहे हैं। मंदिरों का संरक्षण राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा है। उन्होंने शास्त्र और आधुनिक प्रबंधन के समन्वय से मंदिर संस्कृति के पुनरुत्थान पर बल दिया। कार्यक्रम में महाकालेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी घनश्याम शर्मा, सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो. पंकज रावल सहित अनेक विद्वानों एवं विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे। उनके विचारों ने कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय दृष्टि और पारंपरिक आध्यात्मिक गहराई प्रदान की। स्वागत भाषण डॉ. उपेंद्र भार्गव द्वारा प्रस्तुत किया गया, जबकि प्रास्ताविक वक्तव्य डॉ. शुभम शर्मा ने दिया। विभिन्न तकनीकी सत्रों में मंदिर वास्तुशास्त्र, व्यवस्थापन तंत्र, ऐतिहासिक संघर्षों तथा पुनरुत्थान की समकालीन संभावनाओं पर गहन विमर्श हुआ। यह अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी उज्जैन की सांस्कृतिक परंपरा को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हो रही है तथा मंदिर संस्कृति के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए सार्थक शैक्षणिक संवाद का मार्ग प्रशस्त कर रही है।