जेन-जी और जेन-अल्फा : नेताओं ने इतना बड़ा गुब्बारा बना दिया कि अब आंधी का डर सताने लगा है…! -अक्षय जैन
वोट की खेती करने वालों के...
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-प्रकाश त्रिवेदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के...
उज्जैन। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने...

राजनीति बड़ी अजीब चीज है। जिस वर्ग की जरूरत होती है, उसे पहले मतदाता कहा जाता है, फिर वोट बैंक बनाया जाता है। उसके नाम पर योजनाएं बनती हैं, सम्मेलन होते हैं, भाषण होते हैं, घोषणाएं होती हैं और चुनाव आते ही उसी वर्ग के दरवाजे पर नेताओं की कतार लग जाती है।
अब राजनीति को एक नया वर्ग मिल गया है जेन जी और जेन अल्फा।
इन दोनों पीढ़ियों के नाम का इतना बड़ा शोर खड़ा कर दिया गया है कि लगता है जैसे भारत की पूरी राजनीति अब इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमने वाली है।
हर राजनीतिक दल को युवा चाहिए। हर नेता को युवा चेहरा चाहिए। हर पार्टी को युवाओं के लिए नई रणनीति चाहिए। सामाजिक माध्यमों पर युवा दिख रहे हैं, राजनीतिक मंचों पर युवा दिख रहे हैं और चुनावी प्रचार में युवा सबसे आकर्षक चेहरा बन चुके हैं।
लेकिन असली सवाल कोई पूछना नहीं चाहता
जिस युवा के नाम पर राजनीति का इतना बड़ा गुब्बारा फुलाया जा रहा है, उसके हाथ में आखिर है क्या?
डिग्री है, लेकिन नौकरी की गारंटी नहीं।
प्रतियोगी परीक्षा है, लेकिन भविष्य की निश्चितता नहीं।
मोबाइल है, इंटरनेट है, दुनिया की जानकारी है, लेकिन अपने भविष्य को लेकर बेचैनी भी है।
और सबसे बड़ी बात हर पांच साल में उसे बताया जाता है कि उसका भविष्य उज्ज्वल है।
वह पूछता है
“उज्ज्वल कब होगा?”
यही सवाल राजनीति के लिए सबसे खतरनाक सवाल है।
पुरानी राजनीति का युवा और आज का युवा
एक समय था जब युवा का मतलब होता था पार्टी का झंडा उठाना, नेता के पीछे चलना, नारे लगाना और चुनाव के समय भीड़ जुटाना।
नेता मंच से बोलता था और युवा तालियां बजाता था।
अब समीकरण बदल गया है।
नेता बोलता है तो युवा मोबाइल निकालता है।
भाषण सुनने से पहले उसका वीडियो बनता है।
दावा सुनने के बाद उसकी पड़ताल होती है।
नेता कुछ कहता है तो उसका पुराना बयान कुछ ही मिनट में सामने आ जाता है।
नेता वादा करता है तो युवा पूछता है
“इसका पिछला हिसाब क्या है?”
यही बदलाव राजनीति की सबसे बड़ी बेचैनी है।
नई पीढ़ी को अब केवल यह बताकर प्रभावित करना आसान नहीं कि “हम आपके लिए काम कर रहे हैं।”
वह पूछेगी
“कौन सा काम?”
“कब किया?”
“कितने लोगों को फायदा हुआ?”
“और मेरे लिए क्या बदला?”
यानी राजनीति के पुराने “विश्वास करो” मॉडल की जगह “सबूत दिखाओ” वाला मॉडल खड़ा हो रहा है।
जेन जी को वोट बैंक समझना सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी
राजनीतिक दलों को एक भ्रम से बाहर निकलना होगा।
जेन जी कोई पारंपरिक वोट बैंक नहीं है।
इसे केवल जाति के खाने में रखकर नहीं समझा जा सकता।
इसे धर्म के कॉलम में नहीं बांधा जा सकता।
इसे क्षेत्रीय समीकरणों से पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
और सबसे बड़ी बात इसे किसी एक नेता की लोकप्रियता के भरोसे स्थायी रूप से अपने साथ नहीं रखा जा सकता।
आज यह पीढ़ी आपके साथ है तो जरूरी नहीं कि पांच साल बाद भी आपके साथ रहे।
आज रोजगार उसका मुद्दा है।
कल शिक्षा।
परसों महंगाई।
फिर भ्रष्टाचार।
फिर परीक्षा व्यवस्था।
फिर अभिव्यक्ति।
फिर स्थानीय समस्या।
यानी नई पीढ़ी की राजनीति शायद स्थायी निष्ठा से ज्यादा मुद्दा आधारित प्रतिक्रिया पर चलेगी।
यहीं से राजनीतिक दलों के सामने “वोट बैंक” की जगह एक नया “दबाव समूह” खड़ा हो सकता है।
जो सत्ता से सवाल करेगा।
विपक्ष से भी सवाल करेगा।
और जरूरत पड़ी तो अपने पसंदीदा नेता से भी सवाल करेगा।
नेताओं ने गुब्बारे में हवा भरनी शुरू कर दी है
राजनीति ने जेन जी को समझने से पहले उसका बाजार बना दिया।
युवा भारत।
नई पीढ़ी।
युवा शक्ति।
डिजिटल पीढ़ी।
भविष्य के मतदाता।
नारे बहुत हैं।
लेकिन सवाल एक ही है
भविष्य किसका?
उस युवा का जिसके पास डिग्री है और नौकरी के लिए वर्षों तैयारी करनी पड़ रही है?
उसका जो एक प्रतियोगी परीक्षा के बाद दूसरी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में अपनी उम्र निकाल रहा है?
उसका जो परिवार पर आर्थिक बोझ बने बिना अपना व्यवसाय शुरू करना चाहता है?
उसका जो शहरों की महंगी जिंदगी में अवसर तलाश रहा है?
या उस युवा का जिसे चुनाव के कुछ महीने पहले अचानक राजनीतिक दल “देश का भविष्य” बताने लगते हैं?
युवाओं को मंच पर बुलाकर भाषण देना आसान है।
उन्हें निर्णय लेने की मेज पर बैठाना मुश्किल है।
उनके सवाल सुनना मुश्किल है।
उनकी असहमति स्वीकार करना उससे भी मुश्किल है।
लेकिन राजनीति को अब यही मुश्किल काम करना होगा।
रील से राजनीति नहीं बदलेगी
आज नेताओं की सामाजिक माध्यम टीमों में विशेषज्ञ बैठे हैं।
कौन सा वीडियो चलेगा?
कौन सा संगीत लगेगा?
कौन सा चेहरा युवा को पसंद आएगा?
कौन सा संदेश तेजी से फैलेगा?
कौन सा नारा चर्चा में आएगा?
सबकी रणनीति बन रही है।
लेकिन राजनीति एक बात भूल रही है
रील और वास्तविकता में जमीन-आसमान का अंतर है।
युवा को सामाजिक माध्यम पर अच्छा दिखने वाला नेता नहीं चाहिए।
उसे वास्तविक जीवन में काम करने वाला नेता चाहिए।
रील में बेरोजगारी खत्म नहीं होती।
पॉडकास्ट में महंगाई कम नहीं होती।
सेल्फी से परीक्षा व्यवस्था पारदर्शी नहीं होती।
हैशटैग से अस्पताल बेहतर नहीं होते।
और वायरल वीडियो से सड़क नहीं बनती।
इसलिए यदि राजनीति ने जेन जी को केवल सामाजिक माध्यमों के उपभोक्ता के रूप में समझ लिया तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी।
जेन अल्फा : असली कहानी अभी बाकी है
जेन जी तो आज राजनीति के दरवाजे पर दस्तक दे रही है।
लेकिन जेन अल्फा अभी उस दरवाजे के बाहर खड़ी है।
यह वह पीढ़ी है जिसने बचपन से मोबाइल, इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल दुनिया देखी है।
इसकी राजनीतिक चेतना का निर्माण केवल अखबारों की सुर्खियों और नेताओं के भाषणों से नहीं होगा।
यह पीढ़ी सवालों को खोजेगी, तुलना करेगी और जानकारी के कई स्रोतों को देखेगी।
आज जो बच्चा किसी सरकारी स्कूल की खराब व्यवस्था का वीडियो देख रहा है, वह कल उसी व्यवस्था से सवाल पूछ सकता है।
आज जो बच्चा अपने माता-पिता को महंगाई पर चर्चा करते सुन रहा है, वह कल अर्थव्यवस्था को अपने तरीके से समझेगा।
आज जो बच्चा नेताओं को सामाजिक माध्यमों पर देख रहा है, वह कल उनसे पूछ सकता है
“आपने कहा क्या था और किया क्या?”
यही राजनीति की असली परीक्षा होगी।
अब भाषण नहीं, हिसाब की राजनीति होगी
भारत की राजनीति में भाषणों की कोई कमी नहीं रही।
हर सरकार उपलब्धियों की सूची गिनाती है।
हर विपक्ष कमियों की सूची गिनाता है।
हर चुनाव में नए वादे आते हैं।
लेकिन नई पीढ़ी शायद पहली बार इन वादों का हिसाब डिजिटल रिकॉर्ड की तरह रखने वाली है।
यही कारण है कि भविष्य की राजनीति केवल जातीय समीकरणों से नहीं चलेगी।
आंकड़े, प्रदर्शन और जनता की धारणा तीनों का संघर्ष होगा।
और यहां एक और बड़ा बदलाव होगा।
युवा केवल यह नहीं पूछेगा कि
“आपने क्या किया?”
वह यह भी पूछेगा
“आपने जो किया, उसका फायदा किसे मिला?”
यह सवाल राजनीति की जमीन हिला सकता है।
लेकिन जेन जी से भी एक सवाल है
यहां नई पीढ़ी को भी आत्ममुग्ध होने से बचना होगा।
केवल व्यवस्था को गाली देने से व्यवस्था नहीं बदलती।
हर सरकार को कोसने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।
हर वायरल वीडियो सत्य नहीं होता।
हर सामाजिक माध्यम की चर्चा जनमत नहीं होती।
और हर लोकप्रिय व्यक्ति राजनीतिक नेतृत्व के योग्य हो, यह भी जरूरी नहीं।
यदि जेन जी वास्तव में बदलाव चाहती है तो उसे केवल टिप्पणी करने की क्रांति से आगे जाना होगा।
उसे मतदान करना होगा।
स्थानीय समस्याओं में भाग लेना होगा।
नीतियों को समझना होगा।
उम्मीदवारों का रिकॉर्ड देखना होगा।
और सबसे महत्वपूर्ण
जिसे वोट दिया है, उससे पांच साल तक सवाल पूछना होगा।
लोकतंत्र केवल वोट डालने का अधिकार नहीं है।
वोट के बाद निगरानी का दायित्व भी है।
राजनीति की जमीन पर अब नई फसल तैयार हो रही है
सालों से भारतीय राजनीति में वोट की खेती होती रही है।
कभी जाति की जमीन पर।
कभी धर्म की जमीन पर।
कभी क्षेत्र की जमीन पर।
कभी भावनाओं की जमीन पर।
कभी मुफ्त की योजनाओं के पानी से।
कभी नारों की खाद से।
लेकिन अब एक नई जमीन तैयार हो रही है
सवालों की जमीन।
इस जमीन पर पुरानी राजनीतिक खेती आसान नहीं होगी।
यहां बीज बोने से पहले हिसाब देना होगा।
यहां भाषण से पहले प्रदर्शन दिखाना होगा।
यहां पोस्टर से पहले नीति बतानी होगी।
और यहां चुनावी वादे के साथ समय सीमा भी बतानी पड़ सकती है।
युवा पूछ सकता है
“कितने दिन में?”
और अगर जवाब नहीं मिला तो वह अगले चुनाव तक इंतजार करने के बजाय अगले ही दिन सवाल खड़ा कर सकता है।
*क्या देश की आबोहवा बदलेगी?*
बदलाव की संभावना जरूर है।
लेकिन केवल इसलिए नहीं कि जेन जी और जेन अल्फा सामने आ रही हैं।
आबोहवा तब बदलेगी जब यह पीढ़ी अपने प्रभाव को समझेगी।
जब वह वोट को केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी समझेगी।
जब वह पार्टी के नाम से ज्यादा उम्मीदवार के काम को देखेगी।
जब वह सामाजिक माध्यमों की लोकप्रियता से ज्यादा जमीन की वास्तविकता को महत्व देगी।
और जब राजनीतिक दल समझेंगे कि युवा को लुभाना नहीं है, उसका विश्वास जीतना है।
यही अंतर आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करेगा।
गुब्बारा आखिर कितना बड़ा है?
शायद हमने जेन जी और जेन अल्फा के नाम पर सचमुच बहुत बड़ा गुब्बारा बना दिया है।
लेकिन सवाल गुब्बारे के बड़ा होने का नहीं है।
*सवाल यह है कि उसके भीतर क्या है?*
यदि भीतर केवल राजनीतिक प्रचार की हवा है तो यह गुब्बारा किसी दिन फूट जाएगा।
लेकिन यदि उसके भीतर रोजगार की बेचैनी है…
शिक्षा की चिंता है…
महंगाई का दबाव है…
भ्रष्टाचार से नाराजगी है…
अवसरों की तलाश है…
और व्यवस्था से जवाब मांगने का साहस है…
तो सावधान!
वह गुब्बारा नहीं है।
वह आंधी से पहले का दबाव है।
और राजनीति को यह समझना होगा कि आंधी को मंच, पोस्टर, विज्ञापन और सामाजिक माध्यमों के प्रचार से नहीं रोका जा सकता।
आंधी को रोकने का एक ही तरीका है
जिस जमीन से वह उठ रही है, उस जमीन की समस्या को हल करना।
आने वाले भारत का युवा शायद यह नहीं पूछेगा कि आपका झंडा किस रंग का है।
वह पूछेगा
“मेरे भविष्य का रंग क्या है?”
वह यह नहीं पूछेगा कि आपका नेता कितना बड़ा है।
वह पूछेगा
“मेरे लिए उसने कितना किया है?”
वह यह नहीं पूछेगा कि आपका भाषण कितना शानदार है।
वह पूछेगा
“आपके पांच साल का हिसाब कहां है?”
और यही वह क्षण होगा जब भारतीय राजनीति को अपने सबसे पुराने हथियार भावना, भ्रम और चुनावी वादे के साथ एक नया हथियार जोड़ना पड़ेगा
काम
क्योंकि जेन जी और जेन अल्फा को शायद हमेशा के लिए वोट बैंक बनाना संभव नहीं होगा।
उन्हें केवल प्रभावित किया जा सकता है, खरीदा नहीं।
उन्हें केवल सुना जा सकता है, चुप नहीं कराया जा सकता।
और उन्हें केवल सपने दिखाकर हमेशा बहलाया नहीं जा सकता।
राजनीति के लिए संदेश साफ है
युवा को मतदाता समझकर मत तलाशिए।
उसे नागरिक समझकर तलाशिए।
क्योंकि वोट की खेती करने वालों के सामने अब ऐसी पीढ़ी खड़ी हो रही है,
जो खेत में खड़ी फसल काटने नहीं आई है
वह पूछ रही है कि खेत में बीज किसने बोया, पानी किसने दिया और फसल किसके घर गई?
और जिस दिन यह सवाल करोड़ों युवा एक साथ पूछने लगेंगे
उस दिन भारतीय राजनीति में केवल मौसम नहीं बदलेगा…
मौसम बनाने वाले ही बदल जाएंगे।