Gen Z और Gen Alpha : अपेक्षाएँ और विमर्श -हरिश्चंद्र श्रीवास्तव - Samacharline.com
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Gen Z और Gen Alpha : अपेक्षाएँ और विमर्श -हरिश्चंद्र श्रीवास्तव

हमें ईमानदारी से यह देखना होगा कि समस्या कहाँ है, मैं भाजपा के यशस्वी नेतृत्व का हार्दिक अभिनंदन करूँगा, जिसने पार्टी को युवा नेतृत्व देने का कार्य किया और निरंतर राष्ट्र जीवन के विभिन्न आयामों में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है। मैं विशेष रूप से अभिनंदन करूँगा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का, जिन्होंने Gen Z और Gen Alpha के साथ उनकी समस्याओं को समझने तथा समाधान हेतु व्यापक संवाद और संपर्क करने का कार्य स्वयं अपने नेतृत्व में गठित समिति के जिम्मे लिया है। यह इस पीढ़ी की समस्याओं को सुलझाने की दिशा में एक बड़ा और सराहनीय कदम है।

समस्या की जड़ कहाँ है?

वस्तुतः Gen Z और Gen Alpha की समस्याओं के मूल में जो कारण दिखता है, वह है इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों की वह वैश्विक दुनिया, जो इस पीढ़ी के सामने हर क्षण विविध दृश्य, संवाद और सामग्री परोस रही है। इसने बचपन से किशोरावस्था और युवावस्था तक के मानस पटल पर आकांक्षाओं, महत्वाकांक्षाओं और कल्पना की उड़ान को जो असीमित गति दी है, वह बाढ़ में उफनाई नदी के प्रचंड जल वेग की तरह है, जहाँ न कोई सीमा है, न स्पष्ट लक्ष्य और न अनुशासन।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि किशोर और युवा पीढ़ी का संकल्प, अदम्य उत्साह, साहस और कुछ कर गुजरने का जुनून ही बड़े पैमाने पर सृजन करता है। यह ऊर्जा नष्ट नहीं होनी चाहिए, इसे दिशा मिलनी चाहिए। Gen Z और Gen Alpha अनुशासित तथा सकारात्मक सर्जना शक्ति से भरपूर हों, यह दायित्व समाज और शिक्षा जगत का है।

-तीन मूल कारण

इंटरनेट और नीतिगत शून्यता

भारत में सार्वजनिक इंटरनेट सेवा 1995 में VSNL के माध्यम से आई। उस समय से ही अनेक चिंतकों ने इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर आगाह किया था, परंतु किसी भी सरकार ने डिजिटल सामग्री को लेकर कोई ठोस नीति नहीं बनाई।
परिणामस्वरूप आज OTT प्लेटफार्म, YouTube और अन्य डिजिटल माध्यमों पर अश्लील सामग्री, क्रूरतम हिंसा, आक्रोश और नशे को महिमामंडित करने वाली सामग्री बेरोकटोक प्रवाहित हो रही है। यह किशोर और युवा मन को अराजक बनाने तथा नशे जैसी कुप्रवृत्तियों को बढ़ावा देने का काम कर रही है। इंटरनेट आज की अपरिहार्य जरूरत है, लेकिन उस पर परोसी जाने वाली सामग्री का कोई जवाबदेह नियामक ढाँचा आज भी नहीं है।

शिक्षा व्यवस्था का व्यवसायीकरण

भारत में शिक्षा, शिक्षक और विद्यालय की भूमिका कभी उस कुम्हार जैसी थी, जो मिट्टी के लोंदे को धैर्य से गढ़कर आकार देता है। बच्चे शिक्षा के साथ-साथ संस्कार, अनुशासन, खेल भावना और सहअस्तित्व के गुण भी सीखते थे। शिक्षा, शिक्षक और विद्यालय तीनों मिलकर उनकी प्रतिभा निखारते और उन्हें राष्ट्र निर्माण के लिए जिम्मेदार नागरिक बनाते थे।

1991 में वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ने के बाद शिक्षा के इस स्वरूप में आमूल बदलाव आया। आज शिक्षा एक उद्योग बन गई है। कुकुरमुत्ते की तरह फैले कोचिंग संस्थान, डिग्री बाँटने वाले संस्थान और नकल माफिया इसी व्यवस्था की उपज हैं। उद्योग में नैतिकता, संवेदनशीलता या चरित्र निर्माण की को

ई जगह नहीं होती, वहाँ केवल लाभ और हानि होती है।

यही Gen Z की असल त्रासदी है। अपनी पहचान की तलाश, दिशाहीनता, अस्तित्व का संकट। आए दिन मीडिया में खबरें आती हैं कि मोबाइल छिनने पर, परीक्षा में असफलता पर, नौकरी न मिलने पर युवा आत्महत्या कर रहे हैं। यह स्थिति हमारी सामूहिक विफलता की गवाही देती है।

भविष्य की अनिश्चितता और उपभोक्तावादी दबाव

वैश्विक अर्थव्यवस्था के चलते सरकारी, सार्वजनिक और निजी, तीनों क्षेत्रों में तेज़ी से बदलाव आया है। शिक्षा निरंतर महँगी हो रही है, रोजगार अनिश्चित है और प्रतिस्पर्धा बेहिसाब है।

इसके साथ ही समाज में धन-प्रदर्शन की संस्कृति तेज़ी से बढ़ी है। महँगे मोबाइल, ब्रांडेड वस्त्र, लक्जरी वाहन और रुतबे का प्रदर्शन, इन सबको सामाजिक मान्यता मिल रही है। एक को देखकर दूसरे की महत्वाकांक्षा जागती है और जब साधन न हों तो आक्रोश जन्म लेता है। Gen Z और Gen Alpha का एक बड़ा हिस्सा इसी आक्रोश को भीतर लिए जी रहा है।

समाधान की राह

आज आवश्यकता है कि शिक्षाविद, मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री और नीति-निर्माता मिलकर Gen Z और Gen Alpha के मनोविज्ञान को गहराई से समझें। उनसे संवाद करें, उनकी सुनें और उनकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने का ठोस रोडमैप तैयार करें।

यह पीढ़ी समस्या नहीं है। यह पीढ़ी एक विशाल संभावना है। इसे केवल सही दिशा और एक भरोसेमंद व्यवस्था की जरूरत है।

-हरिश्चंद्र श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता, भाजपा, उ.प्र.