जैन दृष्टि में जन्माष्टमी : कृष्ण जन्म के साथ नेमिनाथ के वैराग्य का स्मरण
भारतीय संस्कृति में जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण...
भारतीय संस्कृति में जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण...
हमें ईमानदारी से यह देखना होगा...

भारतीय संस्कृति में जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का पावन पर्व है। जैन परंपरा में भी श्रीकृष्ण का चरित्र विशेष महत्व रखता है। जैन ग्रंथों के अनुसार श्रीकृष्ण और 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ समकालीन थे और दोनों आपस में चचेरे भाई थे। भगवान नेमिनाथ के पिता समुद्रविजय तथा श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव भाई थे। दोनों का संबंध यादव वंश से था।
जैन दर्शन में श्रीकृष्ण को नवम वासुदेव के रूप में वर्णित किया गया है। वहीं भगवान नेमिनाथ उसी युग में जन्म लेकर संसार के वैभव, शक्ति और संबंधों के बीच वैराग्य की ऐसी राह चुनते हैं, जो जैन दर्शन के मूल तत्वों अहिंसा, संयम और आत्मकल्याण को सामने रखती है।
भगवान नेमिनाथ के जीवन का वह प्रसंग अत्यंत मार्मिक है, जब विवाह के लिए जाते समय उन्होंने पशुओं की करुण पुकार सुनी। उनके अंतर्मन में करुणा जागी और उन्होंने विवाह तथा सांसारिक वैभव का त्याग कर दिया। यही प्रसंग बताता है कि जैन धर्म में आध्यात्मिक महानता बाहरी सामर्थ्य में नहीं, बल्कि जीव मात्र की पीड़ा को समझने और आत्मा के कल्याण के लिए मोह का त्याग करने में है।
जन्माष्टमी के अवसर पर कृष्ण और नेमिनाथ के संबंध को याद करना इसलिए महत्वपूर्ण है कि एक ही परिवार और एक ही युग में जन्मे इन दोनों व्यक्तित्वों के माध्यम से भारतीय चिंतन के दो आयाम दिखाई देते हैं—एक ओर कर्मभूमि में पुरुषार्थ और दूसरी ओर संसार से विरक्ति लेकर आत्ममुक्ति की साधना।
इसलिए जैन समाज में जन्माष्टमी का स्मरण केवल उत्सव तक सीमित न रहे। कृष्ण जन्म की प्रसन्नता के साथ नेमिनाथ भगवान के वैराग्य और अहिंसा का चिंतन भी हो। नई पीढ़ी को यह बताया जाए कि हमारी परंपराएं केवल उत्सव मनाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने का संदेश देने के लिए हैं।
कृष्ण जन्म की खुशी हो, नेमिनाथ के वैराग्य का चिंतन हो यही जन्माष्टमी जैन दृष्टि से आध्यात्मिक रूप से सार्थक बन सकती है।
–अक्षय जैन