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उज्जैन। महाकाल मंदिर का विकास और प्रबंधन केदारनाथ एवं काशी विश्वनाथ मंदिर की तर्ज पर होना चाहिए। केवल डिजिटल प्रजेंटेशन और बैठक से कुछ नही होगा। महाकाल मंदिर में व्यवस्था सुधार के लिए मुख्यमंत्री जी विंडो ड्रेसिंग से काम नही चलेगा, गहन सर्जरी की जरूरत है। मंदिर को स्मार्ट मेनेजमेंट की नही सुगम और विनयशील प्रबंधन की जरूरत है। तिरुपति और स्वर्ण मंदिर की तरह प्रबंधन होना चाहिए।
महाकाल मंदिर के प्रबंधन को लेकर उज्जैन से भोपाल तक, लोअर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक सवालों का जबाब तलाशा जा रहा है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पहल करते हुए उच्च स्तरीय कवायद शुरू की है। सरकार की मंशा काबिले तारीफ है पर ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और है।
मंदिर प्रबंधन और विकास को लेकर भोपाल में मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बैठक लेकर सरकार की प्राथमिकता तो प्रदर्शित कर दी है लेकिन अनुभवहीन अधिकारियों और अत्यंत व्यस्त मंत्रियों के सहारे क्या महाकाल का प्रबंधन सुधर पायेगा? इस सवाल का तार्किक जबाब किसी के पास नही है।
महाकाल मंदिर का विकास और प्रबंधन केवल लॉ और आर्डर का विषय नही है,न ही ये भीड़ प्रबंधन का मामला है। विशुद्ध रूप से महाकाल मंदिर प्रबंधन श्रद्धालु प्रबंधन है। पर्यटक और श्रद्धालुओं में अंतर होता है। इस बात को समझना जरूरी है। सारा फोकस पर्यटन विकास पर है,जबकि जन आस्था के केंद्र के रूप में महाकाल मंदिर का विकास और प्रबंधन होना चाहिए। अधोसंरचना विकास जरूरी है,सुविधाओं का विस्तार होना चाहिए,दर्शन आसानी से सुगम और सहज हो ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए।
महाकाल प्रबन्धन में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश और मंदिर की परम्पराओं, मान्यताओं का भी ध्यान रखा जाना जरूरी है।
17 अगस्त को भोपाल में मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मंदिर प्रबंधन की बैठक लेकर अपनी मंशा जाहिर कर दी है। तीन मंत्रियों की हाई पॉवर समिति भी बना दी है। लेकिन लाख टके का सवाल है,अपने राजनीतिक और विभागीय कार्य मे व्यस्त मंत्री कितना समय इस काम मे दे पाएंगे।
सरकार के जिन अधिकारियों को इसमहत्वपूर्ण कार्य का जिम्मा दिया जा रहा है उनका मंदिर प्रबंधन को लेकर क्या नज़रिया है,केवल प्रशासनिक नजरिये से काम नही चलेगा। उज्जैन के पहले कमिश्नर संतोष कुमार शर्मा जैसी दृष्टि भी चाहिए।
महाकाल मन्दिर का विकास और प्रबंधन बिना कोई पुरातात्विक छेड़छाड़ के,मान्य परंपराओं को समाहित कर ही होना चाहिए। सबसे पहले यह मानसिकता बनाना जरूरी है कि सारा प्रबंधन भीड़ या पर्यटक के लिए नही है बल्कि श्रद्धालुओं के लिए है,तभी सही दिशा में काम हो पायेगा।
मुख्यमंत्री जी मंदिर प्रबंधन को आपकी मंशा के अनुरूप बनाने के लिए जनभागीदारी को भी शामिल करना पड़ेगा। अनुभवी नागरिकों, यहाँ पूर्व में पदस्थ रहे प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियो तथा मंदिर प्रबंधन के ख्यात विद्वानों का समूह बनाकर विस्तृत योजना तैयार की जानी चाहिए। अभी केंद्र सरकार की जेएनएनयूआरएम योजना के अंतर्गत महाकाल वन क्षेत्र की डीपीआर को ही कट पेस्ट कर हर बार नए रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है। जबकि इस योजना के क्रियान्वयन में नगर निगम के अधिकारियों ने खूब पलीता लगाया है।
मुख्यमंत्री जी आपकी मंशा उत्तम है,आपकी सरकार की महाकाल मंदिर को लेकर प्राथमिकता भी उच्चस्तरीय है,लेकिन स्थानीय अधिकारियों की अनुभवहीनता,गणमान्य एवम अनुभवी नागरिकों से शून्य संवाद तथा पुराने अनुभवों की अनदेखी आपको भारी पड़ सकती है।
बहरहाल जरूरत महाकाल मंदिर की प्रकृति,परम्पराएँ, मान्यताओं को समझकर आधुनिक उपक्रमों का उनके साथ सामंजस बिठाकर एक सुगम व्यवस्था बनाए जाने की है।
उज्जैन के नागरिकों और यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को मुख्यमंत्री जी आपसे यही अपेक्षा है।
महाकाल मंदिर के लिए श्राईन (देवस्थान) बोर्ड बनाया जाना चाहिए
महाकाल मन्दिर प्रबन्ध समिति एक्ट में संशोधन किया जाना है, सरकार को तीन मंत्रियों की समिति इस आशय के सुझाव देने वाली है। जानकर सूत्रों के अनुसार मंदिर प्रबंधन में अशासकीय नेतृत्व को शामिल किए जाने की कवायद की जा रही है।
अभी तीन अशासकीय सदस्य होते है लेकिन उनका प्रभाव उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर निर्भर करता है।
नई व्यवस्था को देवस्थान बोर्ड की तरह बनाना चाहिए। मंत्री दर्जा प्राप्त प्रतिष्ठित व्यक्ति अध्यक्ष हो,जिले के विधायक, सांसद, जिला परिषद के अध्यक्ष, पुलिस-प्रशासनिक अधिकारी सदस्य हो।
इसके अतिरिक्त मनोनीत तीन विद्वान,विक्रम और पाणिनी विश्वविद्यालय के कुलपति,वेद विद्या प्रतिष्ठान के प्रतिनिधि,महापौर, निगम अध्यक्ष भी बोर्ड में होने चाहिए।
पुजारी,पुरोहित और श्रद्धालुओं के भी एक एक प्रतिनिधि को शामिल किया जाना चाहिए।
देवस्थान बोर्ड के तहत उज्जैन के अन्य मंदिरों का प्रबंधन भी लाया जा सकता है।
बोर्ड में सीईओ के रूप में आईएएस अधिकारी और मुख्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में आईपीएस की स्थापना कैडर बनाकर की जानी चाहिए।
प्रकाश त्रिवेदी